June 29, 2009

जीवन का ए. बी. सी

सजगता, अपनापन तथा प्रतिबद्धता सफलता की कुँजी है. जीवन का ए. बी. सी. क्या है ? यह सजगता, अपनापन तथा प्रतिबद्धता (Awareness, Belongingness, Commitment) है. किसी भी क्षेत्र मे ए. बी. सी. की आवश्यकता होती है. क्या हम इस बात से सजग हैँ कि हम अपने को क्या बता रहे हैँ? किसी भी समाज के लिये इस स्तर की सजगता महत्वपूर्ण है क्योँकि यह समाज मे अपराध को रोक सकती है. इस स्तर की सजगता से किसी अपराधी को अपराध करने से रोकना सँभव है.

एक चोर था . वह एक सँत से मिलने गया. उसने साधु को बताया उसके मन मेँ चोरी करने कि प्रबल इच्छा है. साधु ने कहा कि मैं तुम्हे चोरी करने से रोकने नहीं जा रहा हूं लेकिन जब चोरी करो तो जागरुकता के साथ करो. तीन माह बाद चोर साधु के पास गया और सजगता से बोला ,”मैं चोरी नहीं कर पाया”.

क्रोध के साथ भी यही बात है. यह एक विस्फोट कि तरह आता है और हम अपना आपा खो देते हैं. परंतु वास्तव में तुमने क्या खोया है? तुमने सजगता खोयी है.तुम क्रोध को उत्तेजित कर सकते हो और वह क्रोध तुम्हे नष्ट करने का आवेग बन सकता है. परंतु स्रृजनकर्ता बनने के लिये तुम्हे आवेग को पैदा करने की आवश्यकता नहीं है, तुम्हे केन्द्रित होने कि आवश्यकता है. और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हे सजग रहने कि आवश्यकता है.

अब, किसी में सजगता कैसे काई जा सकती है? हम जीवन में सरल और छोटी वस्तुओं से प्रार्ंभ करें. ऐसी वस्तुएं जो महत्वहीन लगती हैं , जैसे चिड़ियों को गाते हुए सुनना ,सूर्य अस्त होते हुए देखना और इसी तरह अन्य वस्तुएं ,ये तुम्हारी सजगता बढाएगी.

सजगता, बुद्धिमतता पैदा करती है. अपनत्व ह्र्दय को पोषित करती है और प्रतिबद्धता जीवन को पोषित करती है. समस्या यह है कि बहुत थोड़े सृजनकर्ता हैं. लेकिन उनका बहुत अधिक संकल्प है और वे सफल होते हैं.

यदि हम ए.बी.सी. पर ध्यान देते हैं तो हम समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकते है. स्वयं से प्रश्न पूछो, क्या विश्व के सभी लोग आप के अपने हैं? जिस दिन तुम पूछोगे तुम्हारी अध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ हो जाएगी. सजगता के इस प्रसंग के साथ तुम ब्रम्हांड क विज्ञान समझ लोगे.

कुछ मंदिरोँ मे ‘संकल्प’ नामक प्रथा है.वे तुम्हे इस बात का स्मरण कराते हैं कि यह ब्रम्हांड कितना पुराना है और फिर वहां से तुम्हे इस थल(?) मे ले आते हैं. ब्रम्हांड विज्ञान सजगता लाता है, सजगता बढ़ाने की दूसरी विधियां, प्राणायाम, ध्यान, और श्वसन है. भारत मे 180 से अधिक कम्पनियों मे हमने उनके कर्मचारियों को ध्यान सिखाया है. इससे यह अनुभव हुआ कि उनका भी एक जीवन है.वे घर जाते हैं और अपनी पत्नी और बच्चों के साथ समय बिताते हैं ध्यान सीखने से पहले वे केवल बिस्तर पर चले जाते थे. तुम्हे ऊर्जा की आवश्यकता है और वह तुम्हे केवल भोजन और सोने से नहीं मिलेगा.ध्यान तथा चेतना कि शांत स्थिति भी तुम्हे ऊर्जा प्रदान करेगी. जब्अ भी तुम्हे समय मिले, एक साथ बैठो, गाना गाओ और ध्यान करो. इससे एकजुट होने की भावना बढ़ेगी.

’सी’ कौस्मौलौजी, प्रतिबद्धता तथा दया के लिये है. अधिक मुस्कुराओ, थोड़ा हंसी मजाक विनोद तुम्हे व्यथा से दूर रख सकता है. कर्नाटक तथा महाराष्ट्र मे एक प्रथा है कि वे कलश के साथ एक दर्पण रखते हैं. जो भावनाएं तुम्हे व्यथित कर रहीं हैं वे विलीन और विलिप्त हो जाएंगी. प्रतिदिन दर्पण मे देखो और मुस्कुराओ. तुम जितने ही ऊंचे कौर्पोरेट क्षेत्र मे जाते हो , मुस्कुराहट कम होती जाती है. मैं सफलता को मुस्कुराहट से मापता हूं. जितनी गहरी मुस्कान होगी अह यह दर्शाती है कि तुम कितने सुरक्षित हो. और मेरे विचार मे यही है जो तुम्हारे कैरियर मे सफलता को दर्शाती है.

जीवन का ए.बी. सी. तुम्हारे अंदर विस्तार को लाता है. जीवन के प्रति सजगता, पूरि सृष्टि के प्रति अपनत्व और जीवन मे मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, यह हमारी दृष्टि को विस्तृत करने और हमारी जड़ों को गहरा करने मे सहायक होगी.

हंगेरी के विश्वविद्यालय ने दिया श्री श्री को सर्वोच्च सम्मान




बंगलूरू. जून 26.2009

आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक व लोकोपकारी पूज्य श्री श्री रविशंकर को स्ज़ेंट इस्ज़्वान विश्वविद्यालय हंगरी ने अपने सर्वोच्च सम्मान प्रोफेसर हॉनोरिस कॉज़ा (मानद प्रोफेसर) से सम्मानित करा.


श्री श्री,
इस समय युरोप के दौरे पर है. वे विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 10 वीं वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में वक्ता थे. स्ज़ेंट इस्ज़्वान विश्वविद्यालय के उप रेक्टर प्रो डॉ. लैस्ज़लो हॉरनॉक ने श्री श्री को इस सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा.

माओवादी मुद्दा : "वार्ता और आध्यात्मिक शिक्षा ही हल है" - श्री श्री


माओवादी मुद्दा : "वार्ता और आध्यात्मिक शिक्षा ही हल है" - श्री श्री

बंगलूरू. 23 जून, 2009. केन्द्र के द्वारा माओवादियों पर प्रतिबंध पर प्रतिक्रिया देते हुए आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक पूज्य श्री श्री रविशंकर ने आज कहा, "माओवादीयों पर प्रतिबंध लगाने से शायद कोई मदद नहीं मिलेगी. उनकी विचारधारा का सामना वार्ता, प्रेरणा और सबसे महत्वपूर्ण रूप से आध्यात्मिक शिक्षा से किया जा सकता है. किसी को आतंकवादी घोषित करने से हम अपने कृत्यों को सही साबित कर देते हैं पर उनकी मानसिकता में बदलाव नहीं आ पाता."

स्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा, "आध्यात्मिक शिक्षा के अभाव की कारण ही माओवाद की वृद्धि हुई है. अधिकांश माओवादी हिन्दु हैं. दुर्भाग्य से, उन्हें अपने ही आध्यात्मिकता के विषय में किसी ने शिक्षा नहीं दी जिसके कारण वे हिंसा के रास्ते पर निकल पड़े. "

युवाओं में आध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा, "धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, हमने अपनी शिक्षा से पूरी तरह से आध्यात्मिक सामग्री को समाप्त कर दिया है. भारत जिससे पश्चिम देश भी आध्यात्मिकता सीखते है उसी देश को आध्यात्मिक शिक्षा की कमी की वजह से नक्सलवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है".


इस संदर्भ में उन्होंने सरकार को सभी सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में आध्यात्मिक शिक्षा शुरू करने के लिए आग्रह किया, जो बच्चों को सभी धर्मों के सुन्दर पहलुओं को उजागर करे तकि च्चे सभी धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रति सम्मान रख सकें.

तिहरे ग्रहण



ट्रिपल ग्रहणों की श्रंखला जुलाई'09 से प्रारम्भ - दुनिया के लिए इसका क्या अभिप्राय है?

बंगलूरू. 22 जून, 2009.

कुछ ही समय बाद विश्व एक दुर्लभ खगोलीय घटना का साक्षी होगा. जुलाई 2009 की शुरुआत से श्रृंखला से तीन तीन ग्रहण लगेंगे. पहला 7 जुलाई, 2009 को चन्द्र ग्रहण लगेगा , फिर उस के बाद 22 जुलाई, 2009 को सौर ग्रहण लगेगा और अंत में चंद्र ग्रहण 6 अगस्त, 2009 को लगेगा. अगले दशक से 2020 तक ऐसे 6 और ट्रिपल ग्रहण लगेंगे.


दुनिया के लिए इस खगोलीय घटना का क्या मतलब है? क्या यह खगोलीय घटना हमारे लिए कुछ संकेत देती है? लेखक दम्पति डी.के. हरि और डी.के.हेमा हरि ने उनकी किताब - "क्या इतिहास दोहराएगा? जुलाई 2009 के ट्रिपल ग्रहण मंगल या अमंगल?" की समीक्षा के दौरान इस सवाल पर विचार विमर्श किया.

भारत के प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान की सोच की सम्मिश्रित व सर्वांगीण विचारधारा का प्रयोग करते हुए लेखकों ने आने वाले त्रिग्रहणों की एक समग्र दृष्टिकोण से विवेचना करी है.

अपने त्रिग्रहणों पर प्रकाश डालते हुए श्री डी.के.हरि ने कहा कि, "पहला त्रिग्रहण जो 3067 BCE में अभिलिखित हुआ था वह कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के साथ मेल खाता है. दूसरा त्रिग्रहण जो 3031 BCE में हुआ उसके साथ ही द्वारका नगर का विनाश हुआ था. अभी हाल ही में 20 वीं सदी की पहली छमाही में 1910 और 1945 के बीच तीन त्रिग्रहणों की श्रृंखला हुई हुई जो प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों व जापान में हुए परमाणु बम विस्फोट के साथ मेल खाते हैं"

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी जिनकी आर्ट ऑफ लिविंग संस्था यह पुस्तक प्रकाशित कर रही है ने कहा कि, “विश्व में सभी वस्तुओं का परस्पर सम्बन्ध है. सभी का असर सब पर होता है. स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत आपस में सभी सम्बन्धित हैं. कारण और फल के इस सिद्धांत के विश्लेषण से जीवन में एक नया आयाम खुल जाता है."

तो जुलाई 2009 में जब यह ट्रिपल ग्रहण लगेंगे तो इनका क्या प्रभाव पड़ेगा?

भारत के लिए यह एक चिंता का विषय है कि वह ऐसे राष्ट्रों से घिरा हुआ है जो आज आंतरिक राजनीतिक संघर्ष का सामना कर रहे हैं जैसे - पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका. डी.के. हरि और हेमा हरि ने कहा कि पहले ग्रहण के शुरुआत के साथ इन संघर्षों का असर भारत तक पहुँचने की संभावना है.

लेखकों ने प्रदर्शित करा कि प्राचीन भारतीय समाज की राजनीति अपरिहार्य युद्ध और संघर्ष की स्थिति का सार समझ कर कैसे उनक सामना करती थी.

दुनिया के आपदा प्रबंधन क्षमताओं के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने यह उत्तेजक प्रश्न उठाया कि जिस प्रकार से प्राचीन सभ्यताएँ प्राकृतिक या मनुष्य द्वारा बनायी गयी आपदा की स्थिति में बड़े पैमाने पर परागमन का सामना कर लेते थे क्या आज के राष्ट्र उतने ही खुले दिल व दिमाग से बिना जातीय, धार्मिक, और राजनीति भेदभाव के शरणार्थीयों को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं?

लेखकों ने इस संघर्षपूर्ण अवधि के दौरान में उत्पन्न आशा की किरण और सकारात्मक सोच के उद्भव की सम्भावना पर भी प्रकाश डाला जो इस जुलाई 2009 के त्रिग्रहण के साथ प्रकट हो सकते हैं.

"यह पृथ्वी उस अनंत आकाश का एक हिस्सा है” – इस सरल किंतु गहन कथन ने इस सत्य को प्रकट करा कि हम सब प्रकृति के अंश हैं और आगे बढ़ने का रास्ता यही है कि हम अपने विचार, कर्म और जीवन शैली में प्रकृति की भूमिका को समझें और अपने जीवन और कर्मों को प्रकृति के अनुरूप ढालें.

डी.के.हरि और हेमा हरि के काम की प्रासंगिकता पर टिप्पणी देते हुए श्री श्री ने कहा, "हालांकि खगोल विज्ञान व ज्योतिष विज्ञान घटनाओं के विज्ञान का अध्ययन है, उसका उपाय आध्यात्मिकता है. जबकि खगोल विज्ञान / ज्योतिष विज्ञान मनुष्य की बेबसी का संकेत देती है, आध्यात्मिकता उसके भीतर की शक्ति को प्रकाश में लाती है."