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August 12, 2013

श्रावण मास


श्रवण के संस्कृत शब्द का अर्थ है- ‘सुनना’| जीवन में ज्ञान समावेष करने का पहला कदम ‘श्रवण’ है| पहले हम ज्ञान सुनते हैं (श्रवण), फिर बार-बार उसे अपने मन में दोहराते हैं – यह है ‘मनन’, फिर वह ज्ञान हमारे जीवन में समाहित होकर हमारी संपत्ति बन जाता है – यह है ‘निधिध्यासन’|
यह मास है ज्ञान में डूबने का, बड़े-बुजुर्गों से सीखने का और ज्ञान के पथ पर चलने का| पार्वती जी ने इसी मास में शिवजी की पूजा करी थी| शिव को पाने के लिए उन्होंने तपस्या करी| इस समय हम अपने अंतःकरण में डुबकी लगाकर वहाँ व्याप्त शिवतत्व से साक्षात्कार कर सकते हैं|
पार्वती शक्ति का रूप हैं| शक्ति अर्थात बल, सामर्थ्य,एवं उर्जा| शक्ति ही इस पूरी सृष्टि का गर्भस्थान हैं - अतः इस दिव्य पहलु को माता का रूप दिया गया है| शक्ति सब प्रकार के उत्साह, तेजस्व, सौन्दर्य, समता, शांति व भरण-पोषण की बीज है|शक्ति ही जीवन-उर्जा है| इस दिव्य उर्जा, शक्ति के विभिन्न कार्यों के अनुसार उसके अनेकों नाम और रूप हैं| "शक्ति" में जो "इ" है, वह उर्जा है| "इ" के बिना "शिव" बन जाता है "शव"|
गतिशीलता की अभिव्यक्ति ही शक्ति है| शिव तत्व अवर्णनीय है| तुम हवा को बहते हुए महसूस कर  सकते हो, पेड़ों को झूमते हुए देख सकते हो, लेकिन उस स्थिरता को नहीं देख सकते जो इन सभी गतिविधियों का सन्दर्भ बिंदु है| यह गतिशील अभिव्यक्ति शक्ति है| शान्ति व स्थिरता शिव है| दोनों ही आवश्यक हैं| जब गतिशील अभिव्यक्ति का भीतर की स्थिरता से मिलन होता है तब रचनात्मकता, सकारात्मकता, व सत्व उत्पन्न होता है|
शक्ति एक गतिमान बल है| पार्वती आदिशक्ति का अंश है| शिव के सन्दर्भ में वह अर्धांगी है| वह एक तेजस्विनी उर्जा हैं, शिव के गतिशील पहलु का रूप हैं|
एक समय ऐसा भी था जब शक्ति भी तपस में थी| तीर को आगे चलाने के लिए पहले उसे कमान से पीछे की ओर खींचना पड़ता है| श्रावण मास भी निवृत्ति की वह कला है, जब शक्ति भी भीतर की ओर जाती है| आत्मा की व्याकुलता इस तपस से शांत होती है|
जीवन में विरोधाभास सब जगह है, विपरीत साथ में रहते हैं, गर्मी और सर्दी, पर्वत व खाई, हरियाली और हिम - ऐसे कई उदाहरण हैं| गतिशीलता और स्थिरता उर्जा के विरोधाभास हैं| यह विरोधाभास ही जीवन को और रसीला बनाते हैं|
शिव की अर्धांगी के रूप में, वे सुंदर विरोधाभास का प्रतिनिधित्व करतीं हैं, जिससे जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है| शिव करुणा से भरे हैं और शक्ति कृपा से भरी है|शिव इस सृष्टि का स्थिर आधार हैं और शक्ति उसकी गतिशील अभिव्यक्ति| शिव परोपकारी हैं और शक्ति तेजस्विनी हैं| शिव बुद्धिमता के साथ साथ भोलेनाथ हैं और शक्ति बुद्धिमता के साथ कौशल हैं| इस प्रकार उन में सभी गुण साथ में विद्यमान हैं|
शिव और पार्वती स्व-प्रकाशमान हैं और दूसरों के लिए मार्गदर्शक दीप हैं| पार्वती प्रेम, निर्दोषता, देखभाल व भूमिकाओं के निर्वाहन की प्रतिरूप हैं| वे श्रेष्ठ पुत्री, पत्नी व माँ हैं| वह दाम्पत्य का एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं|
पर्व का अर्थ हैं उत्सव| सत्व से उभरने वाला उत्सव| जब तमस का प्रभुत्व होता है, तब वहाँ उत्सव नहीं, बल्कि आलस्य होता है| रजोगुण से उत्पन्न होनेवाला कोई उत्सव अधिक समय तक नहीं टिकता| मात्र सत्व में ही हम सदैव उत्सव मना सकते हैं| शिव मन, संकल्प, विचार, भावना, वाणी और कर्म की शुद्धता के साथ उत्सव के आदिपति हैं| शाश्वत उत्सव पार्वती का प्रतिनिधित्व है| शाश्वत शांति शिव है| वे अनेकों के जीवन का मार्गदर्शन करने वाले अनुकरणीय दम्पति हैं| उन्हें दम्पति भी कहा नहीं जा सकता क्योंकि वे एक ही हैं| जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ| वे इस सृष्टि के माता पिता के रूप में पूजे जाते हैं| ‘प’ मूल शब्द है जो परब्रह्म,परमात्मा के सन्दर्भ में है| ‘प’ पार्वती और परमेश्वर का मूल है| वे उन सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो भौतिक जगत के परे है| वे उत्सव, आनंद, परोपकार व प्रेम के शाश्वत प्रतीक हैं|
 जब तुम भीतर जाते हो, जब तुम स्व में स्थित होते हो, तुम्हारे आसपास उत्सव घटित होता है| इसीलिए यह मास उत्सवों से भरा है| श्री श्री कहते हैं जीवन प्रेम,आनंद और उत्साह है| उत्साह के बिना प्रेम और आनंद जड़ है| पार्वती उत्साह हैं| शिव शांत स्थिरता हैं| उत्सव के साथ प्रेम, आनंद और ज्ञान का समावेश ही जीवन की पराकाष्ठा है|

January 26, 2012

बुद्ध का मौन


बुद्ध को जब बोध प्राप्त हुआ, तो कहा जाता है कि वे एक सप्ताह तक मौन रहे। उन्होंने एक भी शब्द नहीं बोला। पौराणिक कथाएं कहती हैं कि सभी देवता चिंता में पड़ गए। उनसे बोलने की याचना की। मौन समाप्त होने पर वे बोले, जो जानते हैं, वे मेरे कहने के बिना भी जानते हैं और जो नहीं जानते, वे मेरे कहने पर भी नहीं जानेंगे। जिन्होंने जीवन का अमृत ही नहीं चखा, उनसे बात करना व्यर्थ है, इसलिए मैंने मौन धारण किया था। जो बहुत ही आत्मीय और व्यक्तिगत हो उसे कैसे व्यक्त किया जा सकता है?
देवताओं ने उनसे कहा, जो आप कह रहे हैं वह सत्य है, परंतु उनके बारे में सोचें जिनको पूरी तरह से बोध भी नहीं हुआ है और पूरी तरह से अज्ञानी भी नहीं हैं। उनके लिए आपके थोड़े से शब्द भी प्रेरणादायक होंगे। तब आपके द्वारा बोला गया हर शब्द मौन का सृजन करेगा।
बुद्ध के शब्द निश्चित ही मौन का सृजन करते हैं, क्योंकि बुद्ध मौन की प्रतिमूर्ति हैं। मौन जीवन का स्रोत है। जब लोग क्रोधित होते हैं, तो पहले वे चिल्लाते हैं और फिर मौन हो जाते हैं। जब कोई दुखी होता है, तब वह भी मौन की शरण में जाता है। जब कोई ज्ञानी होता है, तब भी वहांपर मौन होता है।
शुरुआत से ही बुद्ध ने संतुष्ट जीवन का निर्वाह किया। हर सुख-सुविधा किसी भी समय उनकी इच्छानुसार उनके सामने हाजिर हो जाती थी। एक दिन उन्होंने कहा कि मुझे बाहर जाकर यह देखना है कि दुनिया क्या है। जब उन्होंने एक बीमार, एक वृद्ध और एक मृत व्यक्ति को देखा, तो उन्होने जीवन के बारे में विचार करना शुरू किया। ये दृश्य यह ज्ञान देने में पर्याप्त थे कि जीवन में दु:ख है।
बुद्ध ने अकेले सत्य की तलाश शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपना महल, पत्‍‌नी और बेटे को छोड़ दिया। उन्होंने वह सब कुछ किया, जो लोगों ने उन्हें बताया। इसके बाद ही वे चार सत्य जान पाए। पहला सत्य है कि दुनिया में दु:ख है। जीवन में सिर्फ दो संभावनाएं हैं- पहली यह कि अपने आसपास के संसार में औरों के दु:ख के अनुभव को देखकर समझ जाना। दूसरी यह कि स्वयं उसका अनुभव करके समझना कि संसार दु:ख है। दूसरा सत्य यह है कि दु:ख के लिए कोई कारण होता है। आप बिना किसी कारण सुखी रह सकते हैं, परंतु दु:ख का कोई कारण अवश्य होता है। तीसरा सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि दु:ख का निवारण संभव है। चौथा सत्य यह है कि दु:ख से बाहर निकलने के लिए एक पथ है।
उस समय इतनी अधिक समृद्धि थी कि बुद्ध ने अपने मुख्य शिष्यों को भिक्षा का पात्र पकड़ा दिया और उनसे भिक्षा मांगने को कहा! उन्होनें राजाओं के शाही वस्त्र उतरवाकर उनके हाथ में भिक्षा का कटोरा दे दिया। यह इसलिए नहीं था कि उन्हें भोजन की आवश्यकता थी, परंतु वे उन्हें कुछ होने से कुछ नहीं होने के पाठ की सीख देना चाहते थे। यह बताना चाहते थे कि आप कुछ नहीं हैं। आप इस विश्व में निरर्थक हैं। जब उस समय के राजाओं और ज्ञानियों को भिक्षा मांगने को कहा गया, तो वे करुणा की मूर्ति बन गए।
अपने सच्चे स्वभाव को देखें कि वह क्या है? वह शांति, करुणा, प्रेम, मित्रता, और आनंद है। मौन में इन सब का उदय होता है। दुख, पछतावे और कष्ट को मौन निगल लेता है और आनंद, करुणा और प्रेम को जन्म देता है।

October 20, 2010

भौतिक सम्पन्नता एवं आध्यात्मिक उन्नति का रहस्य

 
ज्ञान पत्र तिथि : 2010-10-13
स्थान : बंगलौर आश्रम, भारत
नवरात्रि उत्सव के दौरान चल रहे यज्ञों के महत्व के बारे में श्री श्री बताते हुए -   
अस्तित्व के तीन स्तर हैं – बाहरी स्थूल जगत, विभिन्न शक्तियों का सूक्ष्म जगत  और देवत्व या भगवान. यहाँ पर कराये गए सभी यज्ञों का उद्देश्य आध्यात्मिक और भौतिक लाभ दोनों प्राप्त करना है. जब तुम अपनी गहराइयों में डूबते हो, जो सब का स्रोत है, तुम परम शान्ति का अनुभव करते हो.  जब तुम गहरे ध्यान की अवस्था में रहते हो, तभी इन मंत्रों का प्रभाव पड़ता है. वह बहुत ही शक्तिशाली और सुंदर हैं और वे सूक्ष्म जगत को समृद्ध करते हैं. हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमें  इसका हिस्सा बनने का मौक़ा मिला.
यहाँ पर सभी वेदों के पंडित हैं, और वे मंत्र उच्चारण करेंगे. यह हजारों साल से होता आ रहा है. ऐसा पूरे विश्व के कल्याण के लिये किया जाता है. हम सभी यहाँ पर एक शरीर, एक मन और एक आत्मा के रूप में एकत्रित हुए हैं, और यहाँ जो हो रहा है उसमें पूर्ण रूप से निमग्न हैं.  चाहे हम इनका अर्थ नहीं भी जानते हों तब भी हम जानते हैं कि सूक्ष्म स्तर पर ये हमारे जीवन और पूरी मानवता के लिए कुछ अच्छा है.
हो सकता है कि हमारी बुद्धि इसको समझ न पाये परन्तु हमारा सूक्ष्म शरीर इसकी गहराई को समझता है. और जो स्पंदन यहाँ से निकल रहे हैं वे अस्तित्व के सभी सूक्ष्म परतों के लिये कल्याणकारी हैं.  इस ऊर्जा से परोपकार होता है, पूरी मानवता का कल्याण होता है, हमारे बुरे कर्म कट जाते हैं, विश्व में सद्भाव बढ़ता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इच्छाएं पूर्ण होने के लिये सूक्ष्म स्तर में शक्ति होनी  चाहिए. यह हमें आत्म बोध के पास लाता है और दुनिया में सफल बनाता है.
एक शरीर और एक मन के रूप में, परम सत्य में स्थित होकर, अपने सभी सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए शांति की गहराई में विश्राम करो. इस प्रेम और भक्ति में डूब जाओ और यह भावना रखो कि सब कुछ अच्छा हो रहा है, सब कुछ आप के लिए हो रहा है. मकई की तरह - जब वह थोड़ा गर्म किया जाता है, तब वह फूट कर पॉप कॉर्न बन जाता है. उसी प्रकार, यह चेतना दिव्य है और मंत्र के जप से यह कुसुमित होकर प्रकट होती है. चेतना को खिलाने के लिये यह एक सुंदर अवसर है. ओम शांति!

August 20, 2010

सच्ची सफ़लता

आप जीवन में आराम ढूंढ रहे हैं. तुम्हें पैसा क्यों चाहिए? क्योंकि तुम आराम करना चाहते हो. किसी भी दिशा में करी गयी इच्छा का निचोड़ है - आराम.

आराम के कई स्तर हैं. एक शारीरिक है - अगर तुम घास पर बैठे हैं, तो तुम्हें लगता है कि, “ओह, बेहतर होता अगर यहाँ एक तकिया होता”. फिर मानसिक आराम है - यह और भी जरूरी है. यदि तुम पूरे सुख सुविधा के साथ घर में हो, लेकिन मन में आराम नहीं हो तब एक आरामदायक बिस्तर पर भी तुम सो नहीं पाओगे.

एक और प्रकार का आराम है भावनात्मक आराम - तुम्हारे पास सब कुछ हो, पर अगर कोई तुम्हारा करीबी तुम से बात नहीं करे या कुछ ऐसा करे जिससे तुम्हें पीड़ा मिले, तो तुम्हारा भावनात्मक आराम खत्म हो जाता है.

फिर होता है आध्यात्मिक आराम - यह है आत्मा की शान्ति, पूर्ण शांति. यह है अपने भीतर से शांति और आनन्द का एक निरंतर प्रवाह. आराम यानि अपने स्वभाव में रहना.

आराम कहाँ है? यह शरीर में है या मन में? यह दोनों के संयोजन में है. कभी-कभी, जब शरीर को आराम नहीं मिलता तब मन को भी आराम नहीं मिलता और इसका विपरीत भी होता है. शरीर से अधिक, मन की शान्ति महत्वपूर्ण है. शरीर से मन तीन गुणा अधिक ताकतवर है, यानि मानसिक शान्ति शारीरिक आराम से तीन गुणा अधिक महत्वपूर्ण है.

आराम प्रतिबद्धता पर आधारित है. दूसरे लोगों की प्रतिबद्धता तुम्हें आराम देती हैं. उदाहरण के लिए,  तुम तक दूध पहुँचाने की दूधवाले की प्रतिबद्धता तुम्हें आराम देता है. इसी तरह तुम्हारी प्रतिबद्धता से और सभी लोगों को आराम मिलना चाहिए. कभी-कभी लोग कहते हैं,  ‘ओह, मैं प्रतिबद्ध होकर फँस गया हूँ, इसलिये मैं दुखी हूँ.” अब यह नहीं सोचना कि हर प्रतिबद्धता शुरू से ही आसान रहेगी. यदि आप डॉक्टरी पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो रास्ते में कुछ काँटे आना स्वाभाविक है.

हालांकि प्रतिबद्धता तुम्हें सभी बाधाओं के पार ले जा सकती हैं. जितनी अधिक उपलब्धि होगी उतनी ही अधिक प्रतिबद्धता और चाहिये होगी. तुम जितना अधिक प्रतिबद्ध होगे तुम्हारी क्षमता और योग्यता उतनी ही बढ़ेगी. प्रतिबद्धता हमेशा कुछ ऐसे के बारे में होती है जो थोड़ा अधिक हो. तुम यह नहीं कह सकते कि,  'मैं एक गिलास पानी पीने या एक किलोमीटर चलने के लिए प्रतिबद्ध हूँ ', यह तो तुम वैसे भी करते हो. प्रतिबद्धता तभी होती है जब तुम्हें जितना लगता है कि तुम कर सकते हो तुम उससे भी अधिक करो. प्रतिबद्धता यानि अपनी क्षमता के स्तर को बढ़ाना.

सफ़लता के बारे में हर जगह बहुत चर्चे होते हैं. सभी सफ़ल होना चाहते हैं. क्या तुमने कभी सोचा है कि सफ़लता क्या है? यह केवल अपनी क्षमताओं के प्रति अनजान होना है. तुमने अपने आप पर एक सीमा निर्धारित करी है, और जब भी तुम अपनी सीमा को पार करते हो तो अपने आप को सफ़ल होने का दावा करते हो. सफ़लता स्वयं की शक्ति का अज्ञान है क्योंकि तुमने मान लिया है कि तुम केवल इतना ही कर सकते हो.

तुम कभी नहीं कहते 'मैंने सफ़लतापूर्वक एक केला खा लिया!' जब तुम एक सीमा डालते हो तो अपनी  आत्मशक्ति, अपनी चेतना को सीमित कर रहे होते हो. हर बार जब तुमको कोई उपलब्धि मिलती है तब  तुम गर्व महसूस करते हो, है ना? असल में, तुम्हें खेद महसूस होना चाहिए. तुम उसी के प्रति गर्व कर रहे हो जो तुम आसानी से कर सकते हो, जबकि जिसके प्रति तुम्हें गर्व हो रहा है उससे कहीं अधिक तुम्हारी क्षमता है. जब तुम सफ़ल होते हो तो गर्व महसूस होता है और अगर तुम असफ़ल होते हो तो पछतावा होता है जिससे तुम परेशान हो जाते हो.  दोनों परिस्थितियों में तुम आनन्द से दूर हो सकते हो, या अपने सामर्थ्य से दूर हो सकते हो.

तो सबसे अच्छा है कि तुम परमात्मा को समर्पण कर दो. यदि तुम सफ़ल रहे, तो क्या हुआ? यह एक और घटना थी, बस एक और कृत्य जो तुमने किया, तुम इससे बहुत ज्यादा कर सकते हो. यदि तुम कोई चीज़  अच्छी तरह से नहीं कर पाये, तो बस नहीं कर पाये, बस इतना ही. इस पल, क्या तुम उसे फिर से करना चाहते हैं? तो संकल्प लो - 'मुझे कर के ही रहना है!' - तो तुम्हें अच्छी प्रगति मिलेगी, बिना अपराधबोध के, बिना आलोचक बने.


पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी के लेख से अनुवादित 

February 12, 2010

अभी तो बच्चा हूं जी: श्री श्री रवि शंकर





नवभारत
 टाइम्स, 7th February, 2010

हर चेहरे पर मुस्कान देखने की तमन्ना रखने वाले आध्यात्मिक गुरु और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकरविश्वशांति, सौहार्द और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता के लिए भी जाने जाते हैं। पिछले दिनों 'मेरी दिल्ली, मेरी यमुना'अभियान के तहत वह दिल्ली में थे। इस दौरान राजेश मिश्र और प्रभात गौड़ ने उनसे कई मुद्दों पर बातचीत की। पेश हैं इसबातचीत के प्रमुख अंश:

आपने यमुना की सफाई का अभियान शुरू किया है, लेकिन लोग हैं कि धर्म के नाम पर हवन सामग्री, फूल और न जानेक्या-क्या, यमुना में प्रवाहित करते हैं। आप लोगों का आह्वान क्यों नहीं करते कि ऐसी चीजों को यमुना में बहाना धर्म केखिलाफ है?

जहां तक फूल, पत्ते, मिट्टी आदि का सवाल है, तो उसे पानी में बहाने में कोई हर्ज नहीं है। ये चीजें बायोडिग्रेडेबल होती हैंजिनका कोई नुकसान नहीं होता। असली दिक्कत तब आती है जब हम केमिकल और पेंट से बनी हुई चीजें यमुना या गंगा मेंबहाते हैं। ऐसी चीजों को रोकने के लिए लोगों में जागरूकता लाई जानी चाहिए।

शिवसेना और राज ठाकरे आजकल जिस तरह की विभाजन की राजनीति कर रहे हैं, उससे देश को मुक्ति कैसे मिले? आपकोनहीं लगता कि इन्हें भी आर्ट ऑफ लिविंग की जरूरत है?

देखिए, जनता में इसके प्रति सजगता जरूरी है। जनता अगर यह जान ले कि खंडित और सीमित सोच वाले ऐसे राजनेता सिर्फअपना उल्लू सीधा करने के लिए उन्हें बरगला रहे हैं, तो ये अपने आप खत्म हो जाएंगे। जहां तक आर्ट ऑफ लिविंग की बात हैतो उससे तो सभी को फायदा होता है। जाहिर है, सभी लोगों में ऐसे राजनेता भी शामिल हैं।

अगर कोई शख्स लगातार हमारे साथ बुरा किए जा रहा है तो उसके साथ कैसे पेश आना चाहिए?

यह आपके भाव पर निर्भर करता है कि आप उसके साथ किस तरह पेश आएंगे। कोई भी इंसान बुरा नहीं होता। उसे कोई नकोई तकलीफ होती है। हो सकता है, अपनी परेशानियों की वजह से वह बुरा बन गया हो। अगर आप उसे दंड भी देना चाहते हैंतो उसके पीछे मकसद सुधार का होना चाहिए। सुधारक के दृष्टिकोण से कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं होता। सीमित ज्ञान याअज्ञान की वजह से कोई व्यक्ति बुरा बन जाता है। उसे एजुकेट और प्रशिक्षित करना ही सही रास्ता है।

भारत पर भूतकाल में कई हमले हुए हैं। वर्तमान में भी हम निशाने पर हैं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

हमलावरों को ऐसे ही छोड़ देना ठीक नहीं है। ऐसी परिस्थिति आने पर हमें कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन दूसरों के साथसख्ती के बावजूद हमारा भाव सुधार का ही होना चाहिए।

आप कहते हैं - एक्सेप्ट द सिचुएशन एज इट इज। क्या गलत को भी स्वीकार कर लें?

पहले स्वीकार करो कि यह गलत है। यह मत पूछो कि क्यों गलत है। हमारी सारी परेशानियां की वजह यह है कि हम सोचते हैंकि ये क्यों गलत है? किसी ने ऐसा क्यों कहा? भूतकाल को हम क्वेश्चन करते रहते हैं। इससे हम और भी ज्यादा परेशान होजाते हैं। स्वीकार मतलब, भूतकाल को स्वीकार करना कि ऐसा है। चोर क्यों है, ये पूछने से कोई फायदा नहीं है। चोर है येस्वीकार किया, फिर उसके लिए जो सजा तय है, उसे मिलनी चाहिए।

अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?

मैं तो अभी बच्चा ही हूं। मेरा बचपन कभी खत्म ही नहीं हुआ है। न आगे होने की संभावना है। मैं जैसा पहले था, आज भी वैसाही हूं।

आपने शादी नहीं की?

(हंसकर) मैंने कहा न, मैं अभी बच्चा हूं और अपने देश में बाल-विवाह गैरकानूनी है।

ज्ञान प्राप्ति के बाद आपमें क्या बदलाव आए?

मैं पहले से ऐसा ही हूं। मुझमें कुछ बदलाव नहीं आए। बस भीतर एक तड़प थी जो खत्म हो गई।

10 दिन की मौन साधना में क्या हुआ?

जो मैं था, वह औरों को दिखाना चाहता था, बताना चाहता था। दूसरों को उसकी अनुभूति करानी थी। एक प्रेम का अनुभव दूसरेलोगों में पैदा करना चाहता था। दस दिन के मौन के बाद अपने आप ही वह मार्ग मिल गया।

लेकिन कुछ तो चेंज आए होंगे?

हां कुछ तो था जिसे बाहर निकालना था, लोगों के बीच बांटना था। लेकिन उससे पहले भी हम योग, प्राणायाम और ध्यान लोगोंको सिखाते थे। उस वक्त लगता था कि कुछ और भी भीतर है जो लोगों के बीच पहुंचाना है। दस दिनों की साधना के दौरान यहअनुभूति होने लगी कि 'सुदर्शन क्रिया' के इस विशिष्ट ज्ञान को औरों तक पहुंचाना है।

सेक्स के बारे में सही नजरिया क्या होना चाहिए? ब्रह्माचर्य या फिर जितनी मर्जी उतना करो?

यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। अगर कोई सेक्स की अति पर पहुंच जाए, तो ऐसे लोगों के लिए तंत्र में कई तरह की साधनाओंका जिक्र है। सेक्स से परे जाने के लिए भारत के कुछ मंदिरों में नग्न प्रतिमाओं के सामने बैठकर ध्यान करने की भी पद्धतिरही है। साधक वहां बैठकर ध्यान करते थे और सेक्स से ऊपर उठ जाते थे। लेकिन ये सबके लिए नहीं है। सबको इसकी जरूरतभी नहीं है। ध्यान और प्राणायाम करने से भी शरीर और मन की तरंगें बदलती हैं। और व्यक्ति आत्मिक रूप से मजबूत होजाता है।

क्या आप ब्रह्माचर्य के पक्ष में हैं?

ब्रह्माचर्य सहज ही सिद्ध हो तो ठीक है, लेकिन भावनाओं का दमन नहीं करना चाहिए। प्राणायाम, ध्यान और योग के मार्ग मेंजो उतरते हैं उनका ब्रह्माचर्य सहज ही फलित होने लगता है।

आप हर चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं। यह कैसे संभव है?

देखिए, जो हमारे समाने आता है, वह तो मुस्कुराता ही है। और में उसी चेहरे को देखता हूं, जो मेरे सामने आता है।

आप दुनिया को क्या देना चाहते हैं?

मेरे पास सबके लिए बस प्रेम ही प्रेम है। मैं प्यार ही दे सकता हूं, प्यार के सिवा कुछ भी नहीं।

लेकिन एक आम आदमी के लिए आपसे मिलना और आप तक पहुंचना बेहद कठिन है।

नहीं, ऐसा तो नहीं है। मैं तो रोजाना हजारों लोगों से मिलता हूं, उनसे बात करता हूं। हां, कई बार व्यस्त कार्यक्रम के चलतेवक्त निकालना मुश्किल हो जाता है।

हमारे रीडर्स के लिए आपका कोई संदेश?

जीवन एक उत्सव है। इसे मस्त होकर जीना चाहिए। रूखा सूखा जीना भी क्या जीनाअगर हम ये समझ सकें तो सारे तनावों सेमुक्त हो जाएंगे। इसलिए कहता हूं हंसो और हंसाओ, मत फंसो और फंसाओ।

January 2, 2010

सेवा करें और समृद्धि पायें 2010 का सन्देश

सेवा करें और समृद्धि पायें
परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी के द्वारा

            हर वर्ष हम नव वर्ष की शुरूआत दूसरों को खुशी और समृद्धि की शुभ कामनायें देकर करते हैं ।

            समृद्धि का सही लक्षण क्या है ? समृद्धि का लक्षण मुस्कराहट है। समृद्धि का लक्षण संतोष है। समृद्धि का चिन्ह है मुक्ति, मुस्कान तथा जो कुछ भी अपने पास है उसे निर्भय हो कर आस पास के लोगों के साथ बाँटने की मनःस्थिति । समृद्धि का लक्षण यह आस्था और आत्मविश्वास है कि जो कुछ भी मेरी आवश्यकता है वह मुझे मिल जाएगा।

            2010 का स्वागत एक वास्तविक मुस्कुराहट के साथ करें, एक ऐसी मुस्कुराहट जो भीतर से हो। कलैंडर के पन्ने पलटने के साथ साथ हम अपने मन के पन्नों को भी पलटते जाएँ । प्रायः हमारी डायरी स्मृतियों से भरी हुई होती है । आप देखें कि आपके भविष्य के पन्ने बीती हुई घटनाओं से न भर जाएँ । बीते हुए समय से कुछ सीखें, कुछ भूलें और आगे बढ़ें ।

आप लोभ, घृणा, द्वेष, तथा ऐसे अन्य सभी दोषों से मुक्त होना चाहते हो । यदि मन इन सभी नकरात्मकताओं में लिप्त है तो वह खुश तथा शांत नहीं रह सकता । आप अपना जीवन आनंदपूर्वक नहीं बिता सकते । समझें कि नकारात्मक भावनाएँ भूतकाल की वजह से हैं। वर्तमान जीवन के अनुभव को आपका भूतकाल नष्ट न करने पाये । भूतकाल को क्षमा कर दें । यदि आप अपने बीते हुए समय को क्षमा नहीं कर पाएँगे तो आप का भविष्य दुःखपूर्ण हो जाएगा । पिछले साल, जिनके साथ आप की अनबन रही है, इस साल आप उनके साथ सुलह कर लें । भूत को छोड़ कर नया जीवन शुरु करने का संकल्प करें ।

इस बार नववर्ष के आगमन पर हम इस पृथ्वी के लिए शांति तथा संपन्नता के संकल्प के साथ सभी को शुभकामनाएँ दें । आर्थिक मंदी, आतंकवाद की छाया तथा बाढ़ तथा अकाल के इस समय में और अधिक निःस्वार्थ सेवा करें । जानें कि इस संसार में हिंसा को रोकना ही हमारा प्राथमिक उद्देश्य है, तथा विश्व को सभी प्रकार की सामाजिक तथा पारिवारिक हिंसा से हमें मुक्त करना है। समाज के लिए कुछ अच्छा करने का संकल्प लें, जो पीड़ित हैं उन्हें धीरज दें ।

जब भी आप लोगों के लिये उपयोगी हुए तो उसका पुण्य भी आपको मिला -  वह लुप्त नहीं होता। आपके द्वारा किये गये अच्छे कर्म हमेशा पलट कर आपके पास वापस आयेंगे। आज आपके पास यह पूरा विश्व एक परिवार जैसा है। यह हमें महसूस करना है कि हर कोई आपके ही परिवार का हिस्सा है। पूरे राष्ट्र के लिये जिम्मेदारी लें। फिर कोई दुःख नहीं होगा।

            जीवन का आध्यात्मिक पहलू हम में संपूर्ण विश्व और संपूर्ण मानवता के प्रति और अधिक अपनापन, उत्तरदायित्व, संवेदना तथा सेवा का भाव विकसित करता है। सच्चा आध्यात्मिक पहलू जाति, धर्म, तथा राष्ट्रीयता की संकुचित सीमाओं को तोड़ देता है तथा सभी में व्याप्त जीवन ऊर्जा से अवगत कराता है ।

अपनी आंखों को खोलें और देखें की आपको कितना कुछ मिला हुआ है। इस नव वर्ष   पर यह ध्यान दें कि आपको क्या मिला है,  इस पर नहीं कि आपको क्या नहीं मिला। यह कृतज्ञता लाता है। आप जितने कृतज्ञ होंगे उतना अधिक आपको मिलेगा। इसके विपरीत आप जितनी शिकायत करेंगे, उतना ही आपसे ले लिया जायेगा। यीशु मसीह ने भी यही कहा था कि ''जिसके पास है उनको और अधिक मिलेगा और जिसके पास नहीं है उनके पास जो भी है वह उनसे ले लिया जायेगा।'' इसका यही अर्थ है।   

            जो हम से कम सम्पन्न है उनके पास पहुँचे और आभार की भावना के साथ उनकी सहायता करें। आप यह अनुभव करेंगे कि जब आप नि:स्वार्थ सेवा करते हैं तो आपको कितना अधिक संतोष मिलता है। इससे आपको यह भी पता चलेगा कि आपकी अपनी समस्या बहुत छोटी हैं । बार-बार मन में कहना कि ''मुझे क्या मिलेगा?'' मानसिक अवसाद का सबसे बड़ा कारण है। ''मुझे क्या मिलेगा?'' समृद्धि की कमी का लक्षण है।

            इस वर्ष पंछी की तरह मुक्त हो जायें। अपने पंखों को खोलें और उड़ना सीखें। इसको स्वयं अपने भीतर अनुभव करना है। और कुछ भी नहीं है। यदि आप अपने को बंधन में महसूस करते हो तो फिर आप बंधन में ही रहोगे। मुक्त हो जायें। आप अपनी स्वतंत्रता को कब महसूस करेंगे? मरने के बाद? अभी इसी क्षण मुक्त हो जायें। बैठ कर तृप्त हो जायें। कुछ समय ध्यान और सत्संग में बैठें। यह आपके मन को शांत तो करता ही है और साथ ही संसार की चुनौतियों का सामना करने के लिये आपकी चेतना को आंतरिक बल देता है।

            जब मन विश्राम करता है तब बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है । जब मन आकांक्षा, ज्वर या इच्छा जैसी छोटी छोटी चीज़ों से भरा हो तब बुद्धि क्षीण हो जाती है । और जब बुद्धि तथा ग्रहण क्षमता तीक्ष्ण नहीं होती तब जीवन को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। नये विचार नहीं आते  तथा हमारा सामर्थ्य दिन-प्रतिदिन कम होने लगता है। इस ज्ञान से हम अपने छोटे मन के दायरे से बाहर कदम निकाल सकते हैं और यह कदम जीवन की कई समस्याओं का समाधान देगा। केन्द्रित रहने से हमेशा खुशी पास रहती है। इसी शांति से प्रतिभायें उभरती हैं। सहज ज्ञान मिल जाता है, सुंदरता आ जाती है, शांति आती है, प्रेम प्रकट होता है। समृद्धि आती है।