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August 12, 2013

श्रावण मास


श्रवण के संस्कृत शब्द का अर्थ है- ‘सुनना’| जीवन में ज्ञान समावेष करने का पहला कदम ‘श्रवण’ है| पहले हम ज्ञान सुनते हैं (श्रवण), फिर बार-बार उसे अपने मन में दोहराते हैं – यह है ‘मनन’, फिर वह ज्ञान हमारे जीवन में समाहित होकर हमारी संपत्ति बन जाता है – यह है ‘निधिध्यासन’|
यह मास है ज्ञान में डूबने का, बड़े-बुजुर्गों से सीखने का और ज्ञान के पथ पर चलने का| पार्वती जी ने इसी मास में शिवजी की पूजा करी थी| शिव को पाने के लिए उन्होंने तपस्या करी| इस समय हम अपने अंतःकरण में डुबकी लगाकर वहाँ व्याप्त शिवतत्व से साक्षात्कार कर सकते हैं|
पार्वती शक्ति का रूप हैं| शक्ति अर्थात बल, सामर्थ्य,एवं उर्जा| शक्ति ही इस पूरी सृष्टि का गर्भस्थान हैं - अतः इस दिव्य पहलु को माता का रूप दिया गया है| शक्ति सब प्रकार के उत्साह, तेजस्व, सौन्दर्य, समता, शांति व भरण-पोषण की बीज है|शक्ति ही जीवन-उर्जा है| इस दिव्य उर्जा, शक्ति के विभिन्न कार्यों के अनुसार उसके अनेकों नाम और रूप हैं| "शक्ति" में जो "इ" है, वह उर्जा है| "इ" के बिना "शिव" बन जाता है "शव"|
गतिशीलता की अभिव्यक्ति ही शक्ति है| शिव तत्व अवर्णनीय है| तुम हवा को बहते हुए महसूस कर  सकते हो, पेड़ों को झूमते हुए देख सकते हो, लेकिन उस स्थिरता को नहीं देख सकते जो इन सभी गतिविधियों का सन्दर्भ बिंदु है| यह गतिशील अभिव्यक्ति शक्ति है| शान्ति व स्थिरता शिव है| दोनों ही आवश्यक हैं| जब गतिशील अभिव्यक्ति का भीतर की स्थिरता से मिलन होता है तब रचनात्मकता, सकारात्मकता, व सत्व उत्पन्न होता है|
शक्ति एक गतिमान बल है| पार्वती आदिशक्ति का अंश है| शिव के सन्दर्भ में वह अर्धांगी है| वह एक तेजस्विनी उर्जा हैं, शिव के गतिशील पहलु का रूप हैं|
एक समय ऐसा भी था जब शक्ति भी तपस में थी| तीर को आगे चलाने के लिए पहले उसे कमान से पीछे की ओर खींचना पड़ता है| श्रावण मास भी निवृत्ति की वह कला है, जब शक्ति भी भीतर की ओर जाती है| आत्मा की व्याकुलता इस तपस से शांत होती है|
जीवन में विरोधाभास सब जगह है, विपरीत साथ में रहते हैं, गर्मी और सर्दी, पर्वत व खाई, हरियाली और हिम - ऐसे कई उदाहरण हैं| गतिशीलता और स्थिरता उर्जा के विरोधाभास हैं| यह विरोधाभास ही जीवन को और रसीला बनाते हैं|
शिव की अर्धांगी के रूप में, वे सुंदर विरोधाभास का प्रतिनिधित्व करतीं हैं, जिससे जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है| शिव करुणा से भरे हैं और शक्ति कृपा से भरी है|शिव इस सृष्टि का स्थिर आधार हैं और शक्ति उसकी गतिशील अभिव्यक्ति| शिव परोपकारी हैं और शक्ति तेजस्विनी हैं| शिव बुद्धिमता के साथ साथ भोलेनाथ हैं और शक्ति बुद्धिमता के साथ कौशल हैं| इस प्रकार उन में सभी गुण साथ में विद्यमान हैं|
शिव और पार्वती स्व-प्रकाशमान हैं और दूसरों के लिए मार्गदर्शक दीप हैं| पार्वती प्रेम, निर्दोषता, देखभाल व भूमिकाओं के निर्वाहन की प्रतिरूप हैं| वे श्रेष्ठ पुत्री, पत्नी व माँ हैं| वह दाम्पत्य का एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं|
पर्व का अर्थ हैं उत्सव| सत्व से उभरने वाला उत्सव| जब तमस का प्रभुत्व होता है, तब वहाँ उत्सव नहीं, बल्कि आलस्य होता है| रजोगुण से उत्पन्न होनेवाला कोई उत्सव अधिक समय तक नहीं टिकता| मात्र सत्व में ही हम सदैव उत्सव मना सकते हैं| शिव मन, संकल्प, विचार, भावना, वाणी और कर्म की शुद्धता के साथ उत्सव के आदिपति हैं| शाश्वत उत्सव पार्वती का प्रतिनिधित्व है| शाश्वत शांति शिव है| वे अनेकों के जीवन का मार्गदर्शन करने वाले अनुकरणीय दम्पति हैं| उन्हें दम्पति भी कहा नहीं जा सकता क्योंकि वे एक ही हैं| जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ| वे इस सृष्टि के माता पिता के रूप में पूजे जाते हैं| ‘प’ मूल शब्द है जो परब्रह्म,परमात्मा के सन्दर्भ में है| ‘प’ पार्वती और परमेश्वर का मूल है| वे उन सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो भौतिक जगत के परे है| वे उत्सव, आनंद, परोपकार व प्रेम के शाश्वत प्रतीक हैं|
 जब तुम भीतर जाते हो, जब तुम स्व में स्थित होते हो, तुम्हारे आसपास उत्सव घटित होता है| इसीलिए यह मास उत्सवों से भरा है| श्री श्री कहते हैं जीवन प्रेम,आनंद और उत्साह है| उत्साह के बिना प्रेम और आनंद जड़ है| पार्वती उत्साह हैं| शिव शांत स्थिरता हैं| उत्सव के साथ प्रेम, आनंद और ज्ञान का समावेश ही जीवन की पराकाष्ठा है|

January 26, 2012

बुद्ध का मौन


बुद्ध को जब बोध प्राप्त हुआ, तो कहा जाता है कि वे एक सप्ताह तक मौन रहे। उन्होंने एक भी शब्द नहीं बोला। पौराणिक कथाएं कहती हैं कि सभी देवता चिंता में पड़ गए। उनसे बोलने की याचना की। मौन समाप्त होने पर वे बोले, जो जानते हैं, वे मेरे कहने के बिना भी जानते हैं और जो नहीं जानते, वे मेरे कहने पर भी नहीं जानेंगे। जिन्होंने जीवन का अमृत ही नहीं चखा, उनसे बात करना व्यर्थ है, इसलिए मैंने मौन धारण किया था। जो बहुत ही आत्मीय और व्यक्तिगत हो उसे कैसे व्यक्त किया जा सकता है?
देवताओं ने उनसे कहा, जो आप कह रहे हैं वह सत्य है, परंतु उनके बारे में सोचें जिनको पूरी तरह से बोध भी नहीं हुआ है और पूरी तरह से अज्ञानी भी नहीं हैं। उनके लिए आपके थोड़े से शब्द भी प्रेरणादायक होंगे। तब आपके द्वारा बोला गया हर शब्द मौन का सृजन करेगा।
बुद्ध के शब्द निश्चित ही मौन का सृजन करते हैं, क्योंकि बुद्ध मौन की प्रतिमूर्ति हैं। मौन जीवन का स्रोत है। जब लोग क्रोधित होते हैं, तो पहले वे चिल्लाते हैं और फिर मौन हो जाते हैं। जब कोई दुखी होता है, तब वह भी मौन की शरण में जाता है। जब कोई ज्ञानी होता है, तब भी वहांपर मौन होता है।
शुरुआत से ही बुद्ध ने संतुष्ट जीवन का निर्वाह किया। हर सुख-सुविधा किसी भी समय उनकी इच्छानुसार उनके सामने हाजिर हो जाती थी। एक दिन उन्होंने कहा कि मुझे बाहर जाकर यह देखना है कि दुनिया क्या है। जब उन्होंने एक बीमार, एक वृद्ध और एक मृत व्यक्ति को देखा, तो उन्होने जीवन के बारे में विचार करना शुरू किया। ये दृश्य यह ज्ञान देने में पर्याप्त थे कि जीवन में दु:ख है।
बुद्ध ने अकेले सत्य की तलाश शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपना महल, पत्‍‌नी और बेटे को छोड़ दिया। उन्होंने वह सब कुछ किया, जो लोगों ने उन्हें बताया। इसके बाद ही वे चार सत्य जान पाए। पहला सत्य है कि दुनिया में दु:ख है। जीवन में सिर्फ दो संभावनाएं हैं- पहली यह कि अपने आसपास के संसार में औरों के दु:ख के अनुभव को देखकर समझ जाना। दूसरी यह कि स्वयं उसका अनुभव करके समझना कि संसार दु:ख है। दूसरा सत्य यह है कि दु:ख के लिए कोई कारण होता है। आप बिना किसी कारण सुखी रह सकते हैं, परंतु दु:ख का कोई कारण अवश्य होता है। तीसरा सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि दु:ख का निवारण संभव है। चौथा सत्य यह है कि दु:ख से बाहर निकलने के लिए एक पथ है।
उस समय इतनी अधिक समृद्धि थी कि बुद्ध ने अपने मुख्य शिष्यों को भिक्षा का पात्र पकड़ा दिया और उनसे भिक्षा मांगने को कहा! उन्होनें राजाओं के शाही वस्त्र उतरवाकर उनके हाथ में भिक्षा का कटोरा दे दिया। यह इसलिए नहीं था कि उन्हें भोजन की आवश्यकता थी, परंतु वे उन्हें कुछ होने से कुछ नहीं होने के पाठ की सीख देना चाहते थे। यह बताना चाहते थे कि आप कुछ नहीं हैं। आप इस विश्व में निरर्थक हैं। जब उस समय के राजाओं और ज्ञानियों को भिक्षा मांगने को कहा गया, तो वे करुणा की मूर्ति बन गए।
अपने सच्चे स्वभाव को देखें कि वह क्या है? वह शांति, करुणा, प्रेम, मित्रता, और आनंद है। मौन में इन सब का उदय होता है। दुख, पछतावे और कष्ट को मौन निगल लेता है और आनंद, करुणा और प्रेम को जन्म देता है।

October 20, 2010

भौतिक सम्पन्नता एवं आध्यात्मिक उन्नति का रहस्य

 
ज्ञान पत्र तिथि : 2010-10-13
स्थान : बंगलौर आश्रम, भारत
नवरात्रि उत्सव के दौरान चल रहे यज्ञों के महत्व के बारे में श्री श्री बताते हुए -   
अस्तित्व के तीन स्तर हैं – बाहरी स्थूल जगत, विभिन्न शक्तियों का सूक्ष्म जगत  और देवत्व या भगवान. यहाँ पर कराये गए सभी यज्ञों का उद्देश्य आध्यात्मिक और भौतिक लाभ दोनों प्राप्त करना है. जब तुम अपनी गहराइयों में डूबते हो, जो सब का स्रोत है, तुम परम शान्ति का अनुभव करते हो.  जब तुम गहरे ध्यान की अवस्था में रहते हो, तभी इन मंत्रों का प्रभाव पड़ता है. वह बहुत ही शक्तिशाली और सुंदर हैं और वे सूक्ष्म जगत को समृद्ध करते हैं. हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमें  इसका हिस्सा बनने का मौक़ा मिला.
यहाँ पर सभी वेदों के पंडित हैं, और वे मंत्र उच्चारण करेंगे. यह हजारों साल से होता आ रहा है. ऐसा पूरे विश्व के कल्याण के लिये किया जाता है. हम सभी यहाँ पर एक शरीर, एक मन और एक आत्मा के रूप में एकत्रित हुए हैं, और यहाँ जो हो रहा है उसमें पूर्ण रूप से निमग्न हैं.  चाहे हम इनका अर्थ नहीं भी जानते हों तब भी हम जानते हैं कि सूक्ष्म स्तर पर ये हमारे जीवन और पूरी मानवता के लिए कुछ अच्छा है.
हो सकता है कि हमारी बुद्धि इसको समझ न पाये परन्तु हमारा सूक्ष्म शरीर इसकी गहराई को समझता है. और जो स्पंदन यहाँ से निकल रहे हैं वे अस्तित्व के सभी सूक्ष्म परतों के लिये कल्याणकारी हैं.  इस ऊर्जा से परोपकार होता है, पूरी मानवता का कल्याण होता है, हमारे बुरे कर्म कट जाते हैं, विश्व में सद्भाव बढ़ता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इच्छाएं पूर्ण होने के लिये सूक्ष्म स्तर में शक्ति होनी  चाहिए. यह हमें आत्म बोध के पास लाता है और दुनिया में सफल बनाता है.
एक शरीर और एक मन के रूप में, परम सत्य में स्थित होकर, अपने सभी सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए शांति की गहराई में विश्राम करो. इस प्रेम और भक्ति में डूब जाओ और यह भावना रखो कि सब कुछ अच्छा हो रहा है, सब कुछ आप के लिए हो रहा है. मकई की तरह - जब वह थोड़ा गर्म किया जाता है, तब वह फूट कर पॉप कॉर्न बन जाता है. उसी प्रकार, यह चेतना दिव्य है और मंत्र के जप से यह कुसुमित होकर प्रकट होती है. चेतना को खिलाने के लिये यह एक सुंदर अवसर है. ओम शांति!

September 2, 2010

कृष्ण का प्रेम अद्वितीय है

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी

कृष्ण का ज्ञान, माधुर्य और प्रेम अद्वितीय था। किसी भी दृष्टिकोण से उनका व्यक्तित्व पूर्ण था और अनूठा था। यह बताता है कि यह सब गुण आपके अंतर तम में हैं ठीक उसी प्रकार से जैसे सूर्य की किरण में सभी रंग हैं।

पांडवों की माँ महारानी कुंती ने एक बार कृष्ण से कहा, "काश मेरे पास और अधिक परेशानियाँ होतीं। जब भी मैं किसी मुसीबत में थी, तुम हमेशा मेरे साथ थे। तुम्हारे साथ से मिलने वाला आनंद किसी और सुख सुविधा या आराम के आनंद से कहीं अधिक है। मैं कोई भी दुःख सह सकती हूँ। मैं तुम्हारी उपस्थिति के एक पल के बदले में इस दुनिया के सभी सुखों को छोड़ सकती हूँ।"

कृष्ण ने उनको आत्मज्ञान अधिक दिया -  "मैं तुम्हारे अन्दर तुम्हारे स्वयं के रूप में ही हूँ। इस दुनिया में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मैं नहीं हूँ। लोग मुझे एक भौतिक शरीर के रूप में देखते हैं पर वे मेरे सच्चे स्वरुप को नहीं जानते। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार - यह शरीर इन आठ तत्वों से बना है। मैं नौवा हूँ और इन सब से परे हूँ। मैं सर्वव्यापी हूँ। मूर्ख लोग यह नहीं जानते। उन्हें लगता है कि मैं एक मानव हूँ। हालांकि मैं शरीर में हूँ, परन्तु मैं शरीर नहीं हूँ। हालांकि मैं मन के माध्यम से काम कर रहा हूँ, परन्तु मैं मन नहीं हूँ। जैसा मैं तुम्हें दिखता हूँ वह मैं नहीं हूँ, अपनी ज्ञानेन्द्रियों से जितना तुम मुझे जान पायी हो उससे मैं कहीं अधिक हूँ। मैं तुम्हारे दिल में तुम्हारे स्वयं के ही रूप में उपस्थित हूँ और जब कभी भी तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी, मैं वहाँ रहूँगा। मैं तुरंत तुम्हारे पास आ जाऊँगा, तुमको सभी परेशानियों से बाहर निकालूँगा, तुम हमेशा मुझ पर भरोसा कर सकती हो।"

यहां तक कि संतजन भी कृष्ण के प्रेम में डूब गए। वैरागी जन भी उनकी ओर खिंचे चले जाते थे। कृष्ण शब्द का अर्थ है कि जो आकर्षक है, जो कि सब कुछ अपनी और खींचता है। हमारे अस्तित्व का अंतरतम स्तर ऐसा ही है - आत्मा का सुख और परमानंद कुछ ऐसा ही है। वह सब कुछ अपनी और आकर्षित करता है। कृष्ण के जन्म का प्रतीकवाद भी बहुत सुंदर है। देवकी - शरीर, वसुदेव - प्राण यानि सांस एक होकर कृष्ण - यानि भीतर के आनंद और खुशी को प्रकट करते हैं।

कृष्ण हमेशा नीले रंग में दर्शाये जाते हैं। इसका अर्थ है कि शरीर इतना पारदर्शी है, कि उसका अस्तित्व लगभग न के बराबर है। जो अनंत है उसे नीले से दर्शाया जाता है; आकाश नीला है, और समुद्र नीला है। खुद कृष्ण गीता में कहते हैं -  "लोग मेरे सच्चे स्वभाव को नहीं जानते। कोई भी नहीं जानता।”  उनके पूरे जीवन काल में केवल तीन लोग ही उनके सच्चे विराट स्वरुप को जान पाये। पहली यशोदा थीं, दूसरे अर्जुन और तीसरे व्यक्ति उनके बचपन के दोस्त उद्धव थे। वे गीता में कहते हैं, "लोग मुझे भौतिक रूप - एक शरीर के रूप में समझते हैं। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं चेतना हूँ जो सर्वव्यापी है और सब में मौजूद है।” वे आगे कहते हैं, "मैं चीनी में मिठास हूँ, मैं चाँद में चाँदनी हूँ, मैं धूप में गर्मी हूँ।" उन्होंनें अपने आप को “सर्वव्यापी” कहा ।
कृष्ण हमेशा एक पैर को जमीन पर मज़बूती के साथ जमा कर खड़े होते हैं, और उनका दूसरा पैर तिरछा रहता है जो कि ऐसा प्रतीत होता है कि वह ज़मीन छू रहा है लेकिन वास्तव में वह नहीं छू रहा होता है। वह कहीं और है। इसे ‘त्रिभंगी’ मुद्रा कहा गया है। इसका तात्पर्य है जीवन में सम्पूर्ण संतुलन होना।

कृष्णा को माखन चोर कहा गया है। मक्खन दूध का अंतिम उत्पाद है। दूध में जामन डालने से दही जम जाती है और दही को अच्छी तरह से मथ कर मक्खन निकलता है। जीवन भी मंथन की एक प्रक्रिया है। आपके मन में भी बहुत सी बातों द्वारा मंथन हो रहा है - घटनाओं, परिस्थितियों और वाकयों से।

अंत में मक्खन निकलता है जो कि आपका सतचित स्वरुप है। और कृष्ण नवनीत चोर हैं – चितचोर हैं। इसका क्या अर्थ  है? वह प्रेम करते हैं सच्चिदानंद स्वरुप से, वह उस चित से प्रेम करते हैं जो मक्खन जितना नरम हो, जो सख्त न हो। जब तुम्हारा मन ऐसा बन जाता है तब वे तुमको पसंद करने लगते हैं। इसका अर्थ है कि तब अनन्तता तुम्हारी ओर बढ़ने लगती है, वह तुमसे इतना प्यार करती है कि तुम्हारे चित को तुमसे किसी भी कीमत पर चुरा लेती है। वह तुम्हें ढूँढ रहे हैं। तुम जहाँ कहीं भी हो, भगवान आते हैं और तुम्हें ढूंढ लेते हैं।

कृष्ण सभी संभावनाओं के प्रतीक है, मानव के सभी कलाओं और दिव्यता के पूर्ण विकसित स्वरुप के प्रतीक हैं। वास्तव में कृष्ण के व्यक्तित्व को समझना बहुत मुश्किल है। ऋषियों ने उन्हें पूर्ण पुरुष और सभी कलाओं से सम्पन्न दिव्यता का एक सम्पूर्ण अवतार बताया है क्योंकि जो कुछ भी किसी मानव में हो सकता है वह सब कृष्ण में मौजूद है।

जन्माष्टमी वह दिन है जब आप अपनी स्वयं की चेतना में एक बार फिर कृष्ण के विराट स्वरूप को सजीव कर लेते हैं। अपने सत्य स्वरुप को अपने दैनिक जीवन में प्रकट करना ही कृष्ण जन्म का सच्चा रहस्य है।

February 10, 2010

शिवरात्रि – सर्वव्यापक चेतना की जागृति का उत्सव

पूरी सृष्टि शिव जी का खेल है, उस एक चेतना, एक बीज का नृत्य है जिससे संसार के लाखों जीव प्रकट हुए हैं| सारा विश्व शिव के भोलेपन और ज्ञान के शुभ लय में चल रहा है। उर्जा का स्थाई एवं अनन्त स्त्रोत शिव हैं – वे अस्तित्व के इकलौते शाश्वत स्वरूप हैं।

शिवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है वह रात्रि जो तीन साधनों में शिवतत्व को समाहित करती है, वह तत्व जो सबसे परे है। समाधि को शिवसायुज्य, शिव की उपस्थिति भी कहा जाता है, जिसका वर्णन करना बहुत कठिन है। कबीरदास जी ने इसे कोटि कल्प विश्राम- एक क्षण में समाहित करोड़ों वर्षो का विश्राम कहा है। यह सजगता से युक्त गहनतम विश्राम की स्थिति है जो सभी प्रकार की पहचान से मुक्ति दिलाती है।

जब मन दिव्यता की गोद में विश्राम करता है तो वही सच्चा विश्राम है। संस्कृत में रात्रि शब्द का अर्थ है- वह जो तीन प्रकार की व्यथाओं से आप को मुक्त करे। यह तीन साधनों-शरीर, मन और वाणी को विश्राम देती है। वह तीनों प्रकार के दुःख से हमें राहत देती है। ॐ शांति, शांति, शांति – हमें तीन स्तरों पर शांति चाहिये – शरीर, मन और आत्मा के स्तर पर – अधिभौतिक, अधिदैविक, और आध्यात्मिक। केवल तीनों के होने पर ही सम्पूर्ण शांति मिलती है।

शिवरात्रि तब है, जब शिव तत्व और शक्ति एक हो जाते है । शिव तथा शक्ति के मिलन की एक कहानी शिवरात्रि से संबंधित है। आदि तथा चैतन्य शक्ति का अवचेतन से गठबंधन है। शिव मौन साक्षी, चिदाकाश है तथा शक्ति, चित्ति अथवा चित्तविलास है, वह शक्ति जो इस अनंत आकाश में भिन्न-भिन्न आकार, विचार रचती है। शिव निराकार हैं, जबकि शक्ति साकार रूप में प्रकट हुई हैं।  यही पदार्थ और ऊर्जा के द्वैत रूप की पहचान है, प्रकृति और पुरूष,  द्रव्य और गुण,  पदार्थ और उसके गुण। ब्रह्माण्ड में अंतर्निहित अद्वैत स्वरूप की पहचान ही शिवरात्रि है।

शिव को विनाश के साथ जोड़ दिया जाता है; परन्तु परिवर्तन तभी आयेगा, बेहतरी के लिए नई शुरूआत तभी हो सकती है जब कुछ नाश किया जाए। शिव परिवर्तन के तत्व हैं। शंकर का अर्थ हे जो शांति देता है और बहुत कुछ अच्छा करता है । शिव तत्व सर्वव्यापक है। शिवरात्रि इसलिये शुभ है क्योंकि वातावरण उस समय अधिक जागृत हो जाता है।

सर्वव्यापक चेतना की जागृति का पर्व - शिवरात्रि की रात को निद्रा की बेहोशी की अवस्था में जाये बिना मनाया जाता है। यह एक अवसर है जब व्यक्ति हर प्रकार की निद्रा से स्वयं को जगा सकता है। जागरण का अर्थ केवल ऊंची आवाज में भजन गाना या हठपूर्वक स्वयं को जगाए रखना नहीं है। यह है स्वयं को जागृत रखना, आत्मोन्मुख होना एवं अपने अंदर उस विश्राम के प्रति सजग होना, जो नींद में आप को वैसे भी प्राप्त होता है। जब नींद आने की एक अवस्था को आप पार कर लेते हैं तो फिर समाधि लग  जाती है या शिव सायुज्य हो जाता है।

शिव का प्रतीक लिंग है। दिव्यता लिंग के परे है। इसलिए ईश्वर को एकलिंग कहते हैं। आत्मा एकलिंग है। आत्मा शरीर, मन या बुद्धि के परे है,  वह प्रिय और अप्रिय से भी परे है,  आत्मा केवल एक ही है, वह एकलिंग है। शिव शक्ति (शिव की उर्जा ) सभी लिंगों से आकर शिवरात्रि में लीन हो जाती है ।

शिव बहुत ही सरल देव है वे भोले हैं –भोलानाथ। किसी को उन्हें खुश करने के लिये बस बेल पत्ता ही चढ़ाना होता है। परन्तु इस सरलता में एक गहरा संदेश है- बेल पत्र को भेंट करना यह दर्शाता है कि स्वभाव के तीनों गुणों का समर्पण कर दो - तमस, रजस और सत्व। अपने जीवन की  सकारात्मकता और नकारात्मकता को शिवजी को समर्पित करके आपको आनन्दविभोर हो जाना है। सबसे बड़ा चढ़ावा स्वयं का है। स्वयं को समर्पित कर देना जीवन में आनन्द पाने का सूत्र है ।

कैलाश शिवजी का प्रसिद्ध निवास स्थान है। कैलाश का अर्थ है जहाँ पर उत्सव हो । इसलिये जहाँ पर भी आनंद और उत्सव है, वहाँ पर शिवजी उपस्थित होते हैं। चाहे आप सन्यास में हो या संसार में आप शिव से नहीं बच सकते। उनकी उपस्थिति को हर समय महसूस करते रहना शिवरात्रि का सार है। भगवान शिव को हर समय आँख बंद करे हुए गले में नाग लपेटे हुए बैठे हुए दिखाया जाता है। किसी को यह  लग सकता है कि वे सो रहे है परन्तु इससे यह दर्शाता है कि भीतर से वे कैसे है - सर्प के जैसे हर समय सजग।

उनके चित्र में उन्हें हमेशा नीले रंग से दर्शाया जाता है। नीला रंग आकाश की विशालता को दर्शाता है। उनके सिर पर चन्द्र दर्शाता है कि उनके भीतर क्या है। इसलिये सारे भूत, प्रेत, राक्षस भी उनके गण में शामिल हैं। वे कह रहे हैं कि शिव की बारात में सभी प्रकार के लोग हैं। इसलिये इस विश्व में सब कुछ उस परम आत्मा का है। यह कहा जाता है कि ''सर्वम शिवमयम जगत''  - यह सारा जगत शिवमय है।     

शिवरात्रि इस बात का प्रतीक है कि आपके पास जो कुछ भी है उसके प्रति सजग हो जायें और कृतज्ञ हो जायें। सुख के लिये कृतज्ञ रहो जो जीवन में विकास लाता है और दुःख के प्रति भी कृतज्ञ रहो जो जीवन में गहराई प्रदान करता है। यह शिवरात्रि मनाने की सही विधि है।

परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी के द्वारा

October 17, 2009

दिवाली : हर दिल में प्रेम का दिया जलाते चलो - परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर

एक दीपक की बाती को जलने के लिये उसे तेल में डूबे होना चाहिये, और साथ ही तेल के बाहर भी रहना चाहिये. यदि बाती तेल में पूरी डूब जाये तो वह प्रकाश नहीं दे सकती. जीवन भी दीपक की बाती के समान है, तुम्हें संसार में रहते हुए भी उसके ऊपर निष्प्रभावित रहना होता है. अगर तुम पदार्थ जगत में डूबे हुए हो, तो जीवन में आनन्द और ज्ञान नहीं ला पाओगे. संसार में रहते हुए भी, सांसारिक माया के ऊपर उठकर  हम  आनन्द और ज्ञान के ज्योति प्रकाश बन सकते हैं.  
इस प्रकार से ज्ञान के प्रकाश के प्रकट होने का उत्सव ही दिवाली है. दीपावली बुराई पर अच्छाई का, अन्धकार पर प्रकाश का और अज्ञान पर ज्ञान के विजय का त्योहार है। इस दिन घरों में करी जाने वाली रोशनी न केवल सजावट के लिये होती है, बल्कि वह जीवन के गहरे सत्य को भी अभिव्यक्त करती है। हरेक दिल में प्रेम और ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित करें और सभी के चेहरों पर सच्ची मुस्कान लायें.
प्रत्येक मनुष्य में कुछ सद्गुण होते हैं। आपके द्वारा प्रज्ज्वलित प्रत्येक दीपक इसी का प्रतीक है। कुछ में धैर्य होता है, कुछ में प्रेम, शक्ति, उदारता, अन्य में लोगों को साथ मिलाकर चलने की क्षमता होती है। आप में स्थित अव्यक्त सद्गुण दीपक के समान हैं। केवल एक ही दीप जला कर संतुष्ट न हों;  हज़ारों दीप प्रज्जवलित करें क्योंकि अज्ञान के अन्धकार को दूर करने के लिये अनेक ज्योत जलाने होंगे । ज्ञान की ज्योति प्रज्जवलित होने से आत्मस्वरूप के सभी पहलु जाग्रत हो जाते हैं. और उनका जाग्रत और प्रकाशित हो जाना ही दीपावली है.
जीवन का एक और गूढ़ रहस्य दिवाली के पटाखों के फूटने में है। जीवन में कई बार आप पटाखों के समान अपनी दबी हुई भावनाओं, कुंठाओं और क्रोध के कारण अति ज्वलनशील रहते हैं – बस फूटने के लिये तैयार. अपने राग- द्वेष, घृणा आदि को दबाकर फटने की उस स्थिति तक पहुँच जाते कि अब फूटे कि तब. पटाखे फोड़ने की प्रथा हमारे पूर्वजों द्वारा, लोगों की दबी हुई भावनाओं से मुक्ति पाने का एक सुन्दर मनोवैज्ञानिक उपाय है। जब आप बाहर विस्फोट देखते हैं तो आपके अंदर भी वैसी ही कुछ अनुभूति होती है. विस्फोट के साथ प्रकाशपुंज भी होता है। और आप अपनी दबी हुई भावनाओं से मुक्त होते हैं फिर अन्दर में शांति का उदय होता है।
अपने नित नूतन और चिर पुरातन स्वभाव का अनुभव करने के लिये इन दबी हुई भावनाओं से मुक्त होना अति आवश्यक है. दीपावली का अर्थ है वर्तमान क्षण में जीना, अत: अतीत का पछतावा और भविष्य की चिंता छोड़ कर वर्तमान क्षण में जीयें. 
दीपावली की मिठाइयों और उपहारों के आदान प्रदान के पीछे भी एक मनोवैज्ञानिक पहलु है. पुरानी गलतफ़हमी की कड़वाहट को छोड़कर सम्बन्धों को मधुर बनाते चलो.
सेवा भाव के बिना हर उत्सव अधूरा है. परमात्मा ने जो कुछ भी हमें दिया है उस प्रसाद को हमें सबके साथ बाँटना है. क्योंकि जितना बाँटेंगे उतना ही उसकी कृपा और बरसती है. सही मायने में यही दीपावली का उत्सव है. उत्सव का और एक अर्थ है - अपने मतभेदों को मिटाकर अद्वैत आत्मा की ज्योति से अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में विश्राम करना. दिव्य समाज की स्थापना के लिये हर दिल में ज्ञान व आनन्द की ज्योत जलानी होगी. और वह तभी सम्भव है यदि सब एक साथ मिलकर ज्ञान का उत्सव मनायें.
बीते हुए वर्ष के झगड़े फ़साद और नकारात्मकताओं को छोड़कर अपने भीतर उदित हुए ज्ञान पर प्रकाश डालकर एक नयी शुरुआत करना ही दीपावली का उत्सव है. जब सच्चा ज्ञान उदित होता है तब उत्सव होता है। अधिकतर उत्सव में हम अपनी सजगता या एकाग्रता खोने लगते हैं। उत्सव में सजगता बनाए रखने के लिये, हमारे ऋषियों नें प्रत्येक उत्सव को पावन बनाकर पूजा विधियों के साथ जोड़ दिया। इसलिये दिवाली भी पूजा का समय है। दिवाली का आध्यात्मिक पहलु उत्सव में गहरायी लाता है। प्रत्येक उत्सव में आध्यात्म होना चाहिये क्योंकि आध्यात्म के बिना उत्सव छिछला होता है।
जो ज्ञान में नहीं हैं उनके लिये वर्ष में एक बार ही दिवाली आती है, किंतु जो ज्ञानी हैं उनके लिये प्रत्येक दिन, प्रतिक्षण दिवाली है। इस दिवाली को ज्ञान के साथ मनायें और मानवता की सेवा करने का संकल्प लें. अपने दिल में प्रेम का दीपक जलाओ; घर में समृद्धि का दीपक जलाओ; औरों की सेवा के लिये करुणा का दीपक जलाओ; अज्ञान के अन्धकार को मिटाने के लिये ज्ञान का दीपक जलाओ; और हमें दिव्यता द्वारा दिये सम्पन्नता के लिये शुक्राने के दीपक जलाओ. 

August 15, 2009

जन्माष्टमी : सबसे आकर्षक का जन्म - परम पूज्य श्री श्री रविशंकर


जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है । अष्टमी का अर्ध चंद्र महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इस बात का प्रतीक है कि सत्य के भी प्रकट तथा अप्रकट पहलु हैँ जिनमें पूर्ण समन्वय है; प्रकट है पदार्थ संसार तथा अप्रकट है आध्यात्मिक क्षेत्र । इस संसार में लोग चरम की ओर प्रवृत होते हैं। जो पदार्थ जगत की क्रिया कलापों में लिप्त हैं वे जड़ हो जाते हैं, तथा वे जो आध्यात्म में डूबे हैं “अवधूत” हो जाते हैं - अपने आस पास की दुनिया से अनभिज्ञ रहते हैं।

अष्टमी को कृष्ण का जन्म पदार्थ तथा आध्यात्मिक संसार दोनो पर उनके संपूर्ण स्वामित्व को व्यक्त करता है । वह एक महान शिक्षक तथा आध्यात्मिक प्रेरणास्त्रोत हैं तथा साथ ही एक परिपूर्ण राजनीतिज्ञ भी । एक तरफ़ वे योगेश्वर हैं (योग के स्वामी- वह स्थिति जिसे पाने की अभिलाषा सभी योगी रखते हैं) तथा दूसरी तरफ़, वह एक चोर हैं । कृष्ण की सबसे बड़ी निपुणता यह है कि वह एक ही समय में संतों से भी अधिक केंद्रित हैं तथा साथ ही नटखटपने से भरपूर भी ! उनके व्यवहार में दोनों चरम समाहित हैं साथ ही दोनों चरम का पूर्ण संतुलन है । शायद इसीलिए कृष्ण का व्यक्तित्व समझना इतना कठिन है । अवधूत बाह्य संसार के प्रति उदासीन है तथा सांसारिक व्यक्ति, एक राजनेता या एक राजा आध्यात्मिक संसार से अनभिज्ञ है । किन्तु कृष्ण, द्वारिकाधीष तथा योगेश्वर दोनों हैं !

और फिर कृष्ण द्वारा प्रयोग की गई नीतियाँ भी अतुलनीय हैं । किसी भी संत या पैगंबर ने कभी ऐसी नीति प्रयोग नहीं की । कृष्ण का जीवन एकांतवासी साधु का नहीं था वह पूर्णतः कर्मठता से युक्त था । प्रत्येक क्षण घटनाओं से युक्त था, फिर भी सभी घटनाओं से निर्लिप्त । कृष्ण ने दिखाया कि वस्तव में जीवन आनंद है, उत्सव है । केवल कोई कृष्ण ही युद्ध स्थल पर ज्ञान दे सकता है, भोजन, गुण, भक्ति तथा आत्म ज्ञान की बात कर सकता है । और केवल अर्जुन ही उसे समझ सकता है । कल्पना करो कोई हाथ में बंदूक लिए खड़ा हो तथा सत्व, रजस तथा तमस की समीक्षा कर रहा हो । केवल ब्रह्म में स्थित व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है क्योंकि सभी घटनाओं पर उसका नियंत्रण है, या वह सभी घटनाओं के परे है ।

कृष्ण का ज्ञान हमारे समय में बहुत प्रासंगिक है, यह तुम्हें पूरी तरह से पदार्थ में लिप्त होने से रोकता है तथा साथ ही पूर्णतः उससे विमुख भी नहीं करता । यह तुम्हारे जीवन में नई ऊर्जा भर देता है । एक थके हुए तनाव युक्त व्यक्तित्व को अधिक केंद्रित तथा सक्रिय व्यक्तित्व बना देता है । कृष्ण हमें कुशलता युक्त भक्ति का ज्ञान देते हैं । अधिकतर कुशल व्यक्तियों में संवेदनशीलता तथा भक्ति का आभाव होता है तथा सरल तथा श्रद्धावान व्यक्तियों के कार्यों में कुशलता की कमी होती है । कृष्ण के व्यक्तित्व में श्रद्धा तथा कार्यकुशलता के इन विपरीत मुल्यों का श्रेष्ठ संयोजन है । गोकुलाष्टमी उत्सव मनाने का अर्थ है पूर्णतः विपरीत किन्तु एक दुसरे के अनुकूल गुणों को आत्मसाध करना तथा उन्हें जीना ।

कृष्ण का अर्थ है सबसे आकर्षक - आत्म या अस्तित्व । सभी का आत्म कृष्ण है तथा जब हमारे व्यक्तित्व से हमारा सच्चा स्वभाव प्रकट होता है तब, कुशलता तथा संपन्नता स्वयं आने लगती हैं । जैसा कि कृष्ण ने गीता में कहा, वह समर्थ में सामर्थ्य हैं, ज्ञानी में ज्ञान, सुन्दर में सुंदरता तथा गंभीर में गांभीर्य हैं । वह सभी जीवों की जीवन ऊर्जा हैं । और जन्माष्टमी वह दिन है, जब आप कृष्ण के उस विराट स्वरूप को अपनी चेतना में फ़िर से जागृत करते हैं । आपने सच्चे स्वभाव से अपना जीवन जीना ही कृष्ण के जन्म का वास्तविक रहस्य है ।

इस प्रकार जन्माष्टमी मनाने का सबसे सार्थक तरीका है यह जानना कि आप की दो भूमिकाएँ हैं - राष्ट्र का ज़िम्मेदार नागरिक होना तथा साथ ही यह समझना कि आप सभी घटनाओं से परे हैं - निरंजन ब्रह्म । जन्माष्टमी मनाने का वस्तविक तात्पर्य है अपने जीवन में थोड़ा सा अवधूत तथा थोड़ी सी क्रियाशीलता का समावेश करना ।

July 7, 2009

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा—भक्तों का दिन

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी

गुरुपूर्णिमा को गुरु का दिन कहते हैं लेकिन वास्तव मे यह है भक़्त का दिन. यह कृतज्ञता महसूस करने का दिन है, इस सुंदर ज्ञान के लिये जो की तुम्हारे सदगुरु से तुम्हे मिला है. कृतज्ञता महसूस करो कि कैसे इस ज्ञान ने तुम्हे परिवर्तित कर दिया है. कृतज्ञता व विनम्रता से भीतर सच्ची प्रार्थना का उदय ( आविर्भाव) होता है. तीन प्रकार के लोग गुरु के पास आते है—विद्यार्थी, शिष्य व भक्त (श्रद्धालू).

एक विद्यार्थी गुरु के पास आता है, कुछ सीखता है, कुछ जानकारी प्राप्त करता है और स्कूल छोड़ देता है.यह ऐसे ही है जैसे गाइड के पास जाना हो. तुम पर्यट्न- गाइड के साथ कोई पर्यटन – स्थल देखने जाते हो और वह तुम्हे सारे स्थल दिखा देयता है और उनके बारे मे थोड़ी बहुत जानकारी भी दे देता है और फिर तुम उसे धन्यवाद कह देते हो और बात खत्म हो जाती है. विद्यार्थी वह होता है जो केवल जानकारी एकत्रित करता है लेकिन जानकारी ज्ञान नहीं होती और ना ही विवेक होती है.

तब होता है शिष्य, शिष्य-गुरु के पद-चिन्हों पर चलता है लेकिन उसका उद्देश्य होता है ज्ञान हासिल करना और अपने जीवन क सुधार करना. अत: वह केवल जांकारी एकत्रित नहीं करता बल्कि थोड़ा और भीतर तक जाता है. वह अपने जीवन मे परिवर्तन लाना चाहता है और अपने जीवन का कुछ मतलब बनाना चाहता है. वह अपना समय निकालता है, अपनी क्षमता के अनुसार उन्नति करता है और हो सकता है उसे एक न एक दिन प्रबोध हो भी जाए. तब बारी आती है भक्त की. उसका उद्देश्य बोध प्राप्त करना भी नहीं होता. वह तो केवल प्रेम मे डूबा रहता है.उसे तो केवल सदगुरु से, प्रभु से, अन्नता से प्रेम हो जाता है. वह यह चिंता नहीं करता कि उसे बोध प्राप्त हुआ या नहीं. उसे यह भी चिंता नहीं होती कि उसे काफी बुद्धिमता प्राप्त होगई या नहीं.बस वह तो हर पल प्रेम मे डूबा रहता है और उसके लिये यहि काफी होता है. ऐसे भक्त मिलना बहुत मुश्किल होता है. विद्यार्थी तो बहुत होते हैं, शिष्य थोड़े कम होते हैं.लेकिन भक्त कोई विरले ही होते हैं.

भगवान बनना कोई बड़ी बात नहीं है. कोई भी वस्तु तुम चाहो या ना चाहो भगवान ही है.केलिन भक्ती कहीं कहीं ही प्रस्फुटित होती है. जहां ऐसी भक्ति उत्पन्न होती है, वही भक्त है. आकर्षण हर जगह होता है पर प्रेम कहीं कहीं, लेकिन भक्ति तो बहुत हि दुर्लभ होती है.यह बहुत सुंदर चीज है.

एक विद्यार्थी आँखों में आँसू लेकर गुरु के पास आता है और जब जाता है तब भी उसकी आँखों मे आँसू होते है लेकिन यह आँसू थोड़ अलग तरह के होते हैं, ये कृतज्ञता के आँसू होते है,प्रेम के आँसू होते है. प्रेम मे रोना बहुत सुंदर है. जो एक बार भी प्रेम मे रोया है ,वही इसका स्वाद जानता है और जब भी ऐसा होता है तो पूरी सृष्टि इसका आनन्द मनाती है.पूरी सृष्टि एक ही चीज चाहती है और वह है नमकीन आँसुओं को बदल कर मीठा हो जाना.

प्रेम ऐसी चीज है जिसमे विधाता भी आनन्द मानते है. जितना तुम प्रभु को चाह्ते हो, वे भी तुम्हे उत्ना ही चाहते है. प्रभु भी तुम्हरे आने का इंतजार करते हैं.प्रभु भी तुम्हारे नजदीक आने को उत्ना ही उतावले हैं जित्ना तुम उनक पास जाने को. जब भी इस ध्रा पर किसी भक्त का आविर्भाव होता है तो प्रभु बहुत प्रसन्न होते है. इस लिये गुरुपूर्णिमा भक्त का दिन माना जाता है

June 29, 2009

तिहरे ग्रहण



ट्रिपल ग्रहणों की श्रंखला जुलाई'09 से प्रारम्भ - दुनिया के लिए इसका क्या अभिप्राय है?

बंगलूरू. 22 जून, 2009.

कुछ ही समय बाद विश्व एक दुर्लभ खगोलीय घटना का साक्षी होगा. जुलाई 2009 की शुरुआत से श्रृंखला से तीन तीन ग्रहण लगेंगे. पहला 7 जुलाई, 2009 को चन्द्र ग्रहण लगेगा , फिर उस के बाद 22 जुलाई, 2009 को सौर ग्रहण लगेगा और अंत में चंद्र ग्रहण 6 अगस्त, 2009 को लगेगा. अगले दशक से 2020 तक ऐसे 6 और ट्रिपल ग्रहण लगेंगे.


दुनिया के लिए इस खगोलीय घटना का क्या मतलब है? क्या यह खगोलीय घटना हमारे लिए कुछ संकेत देती है? लेखक दम्पति डी.के. हरि और डी.के.हेमा हरि ने उनकी किताब - "क्या इतिहास दोहराएगा? जुलाई 2009 के ट्रिपल ग्रहण मंगल या अमंगल?" की समीक्षा के दौरान इस सवाल पर विचार विमर्श किया.

भारत के प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान की सोच की सम्मिश्रित व सर्वांगीण विचारधारा का प्रयोग करते हुए लेखकों ने आने वाले त्रिग्रहणों की एक समग्र दृष्टिकोण से विवेचना करी है.

अपने त्रिग्रहणों पर प्रकाश डालते हुए श्री डी.के.हरि ने कहा कि, "पहला त्रिग्रहण जो 3067 BCE में अभिलिखित हुआ था वह कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के साथ मेल खाता है. दूसरा त्रिग्रहण जो 3031 BCE में हुआ उसके साथ ही द्वारका नगर का विनाश हुआ था. अभी हाल ही में 20 वीं सदी की पहली छमाही में 1910 और 1945 के बीच तीन त्रिग्रहणों की श्रृंखला हुई हुई जो प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों व जापान में हुए परमाणु बम विस्फोट के साथ मेल खाते हैं"

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी जिनकी आर्ट ऑफ लिविंग संस्था यह पुस्तक प्रकाशित कर रही है ने कहा कि, “विश्व में सभी वस्तुओं का परस्पर सम्बन्ध है. सभी का असर सब पर होता है. स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत आपस में सभी सम्बन्धित हैं. कारण और फल के इस सिद्धांत के विश्लेषण से जीवन में एक नया आयाम खुल जाता है."

तो जुलाई 2009 में जब यह ट्रिपल ग्रहण लगेंगे तो इनका क्या प्रभाव पड़ेगा?

भारत के लिए यह एक चिंता का विषय है कि वह ऐसे राष्ट्रों से घिरा हुआ है जो आज आंतरिक राजनीतिक संघर्ष का सामना कर रहे हैं जैसे - पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका. डी.के. हरि और हेमा हरि ने कहा कि पहले ग्रहण के शुरुआत के साथ इन संघर्षों का असर भारत तक पहुँचने की संभावना है.

लेखकों ने प्रदर्शित करा कि प्राचीन भारतीय समाज की राजनीति अपरिहार्य युद्ध और संघर्ष की स्थिति का सार समझ कर कैसे उनक सामना करती थी.

दुनिया के आपदा प्रबंधन क्षमताओं के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने यह उत्तेजक प्रश्न उठाया कि जिस प्रकार से प्राचीन सभ्यताएँ प्राकृतिक या मनुष्य द्वारा बनायी गयी आपदा की स्थिति में बड़े पैमाने पर परागमन का सामना कर लेते थे क्या आज के राष्ट्र उतने ही खुले दिल व दिमाग से बिना जातीय, धार्मिक, और राजनीति भेदभाव के शरणार्थीयों को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं?

लेखकों ने इस संघर्षपूर्ण अवधि के दौरान में उत्पन्न आशा की किरण और सकारात्मक सोच के उद्भव की सम्भावना पर भी प्रकाश डाला जो इस जुलाई 2009 के त्रिग्रहण के साथ प्रकट हो सकते हैं.

"यह पृथ्वी उस अनंत आकाश का एक हिस्सा है” – इस सरल किंतु गहन कथन ने इस सत्य को प्रकट करा कि हम सब प्रकृति के अंश हैं और आगे बढ़ने का रास्ता यही है कि हम अपने विचार, कर्म और जीवन शैली में प्रकृति की भूमिका को समझें और अपने जीवन और कर्मों को प्रकृति के अनुरूप ढालें.

डी.के.हरि और हेमा हरि के काम की प्रासंगिकता पर टिप्पणी देते हुए श्री श्री ने कहा, "हालांकि खगोल विज्ञान व ज्योतिष विज्ञान घटनाओं के विज्ञान का अध्ययन है, उसका उपाय आध्यात्मिकता है. जबकि खगोल विज्ञान / ज्योतिष विज्ञान मनुष्य की बेबसी का संकेत देती है, आध्यात्मिकता उसके भीतर की शक्ति को प्रकाश में लाती है."