September 17, 2008

गणेश चतुर्थी


गणेश चतुर्थी तब मनाया जाता है,जब भगवान गणेश पृथ्वी पर अपने सभी भक्तो के लिए प्रकट हुए. गणेश गज के सिर वाले, शिव पार्वती के पुत्र, जिनको बुद्धि ,समृद्धि और सौभग्य प्रदान करने वाले सर्वोच्च देवता के रुप मॅ पूजा जाता है. हाँलाकि, यह उत्सव उनके जन्मदिवस के रुप मॅ मनाया जाता है, परंतु इस त्यौहार के पीछे क प्रतीक बहुत गूढ- है.
गणेश जी के सारतत्व आदि शँकराचार्य ने बहुत ही सुन्दर रूप मॅ लाया है. हाँलकि गणेश जी की उपासना गजवदन के रूप मॅ की जाती है लेकिन उनका यह रूप उनके परब्रम्ह रूप को उभारता है.गणेश जी का वर्णन ‘अजम निर्विकल्पम निराकारमेकम’ के रूप मॅ किया जाता है – जिसका मतलब है कि गणेश जी अजन्मा हैँ.
वे अजम हैँ, निराकार हैँ, व निर्विकल्प हैँ. गणेश उस चेतना के प्रतीक हैँ जो सब जगह व्याप्त है. ग्णेश उस ऊर्जा के स्रोत हैँ जो इस ब्रम्हांड का कारण है, जिससे सबकुछ उत्पन्न हुआ है और सबकुछ समा जाएगा. गणेश कहीँ बाहर नहीँ हैँ बल्कि हमारे जीवन के केन्द्र मए हैँ. परंतु यह बहुत ही सूक्ष्म ज्ञान है. हर कोई निराकार का अनुभव बिना आकार के नहीँ कर सकता है. हमारे प्राचीन ऋषि, मुनि तह जानते थे इसलिए उन्होँने यहाँ रूप बनाया जो सभी स्तर के लोगोँ के लिए लाभदायक हो और सभी इसे समझ सकेँ. वे जो इस निरकार का अनुभव नहीँ कर सकते , वे साकार की अभिव्यक्ति का कुछ अनुभव निर्वाह करने के बाद निराकार ब्राह्म्ण के रूप तक पहुँच जाते हैँ.
इसलिए वास्तविकता मॅ गणेश निराकार हैँ, फिर भी आदि शँकराचार्य ने उनके साकार रूप को पूजा और यह साकार रूप यह सन्देश देती है कि गणेश जी निराकार है. इस प्रकार यहाँ साकार रूप एक प्रारम्भ बिँदु के रूप मॅ पूर्ति करते हुए धीरे धीरे निराकार चेतना को अभिव्यक्त करती है. गणेश चतुर्थी निराकार परमात्मा – श्री गणेश तक बार बार उनके अभिव्यक्त रूप की पूजा कर , पहुँचने की अनूठी कला है. यहाँ तक की गणेश स्त्रोम जो गणेश जी की प्रशँसा मॅ गाया जाता है . वह भी यही ब्ताता है. हम गणेश जी से प्रार्थना करते हैँ कि वे कुछ समय के लिए हमारी चेतना से निकल कर गणेश मूर्ति मॅ विराजेँ जिससे हम उनके साथ खेल सकेँ. पूज के समापन के बाद हमारा उनसे अपनी चेतना मॅ वापस आने के लिए प्रार्थना करते है. जब वे मूर्ति मॅ विराजित होटल हैँ तब हमारा पूजा के द्वारा भगवान को वही अर्पण करते हैँ जो भगवान ने हमेँ दिया है.
कुछ दिनोँ कि पूजा के बाद मूर्ति विसर्जन यहाँ प्रबलता से समझाता है कि भ्गवान मूर्ति मॅ नहीँ बल्कि हमारे अन्दर हैँ. तो सर्वव्यापी को साकार मॅ अनुभव करना और उससे आनन्द प्राप्त करना ही गणेश चतुर्थी का सार है. एक तरह से ऐसे उत्सव का आतयोजन करना एक जोश और भक्ति की लहर का नेत्रित्व करती है.
गणेश हमारे भीतर के सभी अच्छे गुणो के देवता हैँ.इसलिए जब हम उनकी पूजा करते हैँ तब हमारे अन्दर के सभी अच्छे गुण खिल जाते हैँ. वे बुद्धि व ज्ञान के भी देवता हैँ. जब हमारा अपनी आत्मा के बारे मॅ सजग होते हैँ तब हमारे अन्दर ज्ञान का उदय होता है. जहाँ आलस्य है वहाँ अज्ञान है, बुद्धि नहीँ है, चैतन्यता नहीँ है और जीवन का विकास भी नहीँ है. इसलिए चेतना को जगाना है, और इस चेतना मॅ व्याप्त श्री गणेश ही हैँ. तभी हर पूजा के पहले गणेश जी की पूजा होती है.

इसलिए, गणेश जी की मूर्ति अपने अन्दर ही स्थापित कर, उनका ध्यान व अनुभव कर अनंत प्रेम के साथ उनकी पूजा करनाहै. यही गणेश चतुर्थी का प्रतीकात्मक सार है, अपने अन्दर व्याप्त गणेश तत्व को जगाना है.

मधु

18 अक्टूबर, 2001
बैंगलौर आश्रम
भारत

मधु

हो जाए लहराती पवन मधुर,
हो जाए बहता सागर मधुर,
हो जाए हर पत्ता, हर जड़ी-बूटी उपकारक, हो जाए हर रात मधुर,
हो जाए हर दिन मधुर,
हो जाए धरती का हर रजकण हमारे लिये मधुर,
हो जाए स्वर्गलोक और सभी पूर्वज हमारे प्रति मधुर,
हो जाए हर पेड़ मधुमय,
हो जाए सूर्य मधुर,
हो जाए उसकी हर किरण अनुकूल,
हो जाए सभी पशुओं का स्वभाव मधुर, हो जाए हमारा भोजन अनुकूल,
हो जाए हमारा हर विचार मधुर, हो जाए हमारी वाणी मधुर,
हो जाए हमारा जीवन पवित्र व दिव्य,
हो जाए जीवन मधु जितना मीठा ।

चिन्ता और भावनाएँ

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 315
26 जुलाई, 2001
उत्तरी अमेरिका आश्रम क्यूबेक
कैनेडा

चिन्ता और भावनाएँ
सिर में चिन्ता रहती है और दिल में भावनाएं। दोनों एक ही समय पर कार्य नहीं कर सकते। जब तुम्हारी भावनाएँ प्रबल होती हैं तब चिन्ताएँ घुल जाती हैं। यदि तुम बहुत चिन्ता करते हो, तुम्हारी भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं; तुम सिर में ही अटक जाते हो। चिन्ताएँ तुम्हारे दिमाग और दिल को निष्क्रिय और सुस्त बना देती हैं। चिन्ताएं सिर पर पत्थर रखने जैसा है। चिन्ताएं तुम्हें उलझा देती हैं, तुम्हें एक पिंजरे में जकड़ लेती हैं। जब तुम्हें भावनाएं छूती हैं तब तुम चिन्ता नहीं करते। भावनाएँ फूलों के समान होती हैं वे निकलते हैं, खिलते हैं और विलीन हो जाते हैं। भावनाएँ उठती हैं, गिरती हैं और फिर लुप्त हो जाती हैं। जब हम भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं तब हमें आराम मिलता है। क्रोधित होने पर जब तुम अपना गुस्सा व्यक्त करते हो तो अगले ही पल तुम हल्का महसूस करते हो। दुःखी होने पर जब तुम रोते हो तो हल्के हो जाते हो। भावनाएँ कम समय के लिए रहती हैं और फिर लुप्त हो जाती हैं परन्तु चिन्ताएँ चिता समान हैं जो तुम्हें लम्बे समय तक खाती रहती हैं। भावनाएँ तुम्हें सहज बनाती हैं। बच्चे भावनाओं को महसूस करते हैं इसलिए वे सहज होते हैं परन्तु वयस्क अपनी भावनाओं पर लगाम लगाते हैं और चिन्ता करना शुरू कर देते हैं। किसी भी बात की चिन्ता से काम में रुकावट आता है जबकि भावनाएं काम को आगे बढ़ाती हैं। यदि हम अपनी नकारात्मक भावनाओं के प्रति चिन्तित हैं तो यह एक कृपा है क्योंकि ये चिन्ता इन भावनाओं पर लगाम लगाती हैं और तुम्हें उनपर कार्यवाही नहीं करने देती। आमूमन सकारात्मक भावनाओं के प्रति चिन्ताएँ कभी नहीं होती। चिन्ता में अनिश्चितता होती है। चिन्ता तुम्हारी उर्जा को नष्ट कर देती है, और जब तुम चिन्ता करते हो तब तुम स्पष्ट रूप से सोच नहीं पाते। चिन्ताओं को समर्पित करना प्रार्थना है और प्रार्थना तुम्हें भावनाओं की ओर ले जाती है।
प्राय: जब तुम सोचते हो कि तुम बहुत अधिक भावनात्मक हो गए हो तब तुम अपनी भावनाओं के बारे में चिन्ता करना शुरू कर देते हो । चलो इसकी चिन्ता छोड़ो और भोजन को महसूस करो।

विश्राम का परम आनन्द

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 314
19 जुलाई, 2001
उत्तरी अमेरिका आश्रम क्यूबेक
कैनेडा

विश्राम का परम आनन्द
विश्राम से भी आनन्द प्राप्त होता है और कर्म से भी आनन्द प्राप्त होता है। कर्म में मिला आनन्द क्षणिक होता है और उससे थकान होती है, जबकि विश्राम से मिला आनन्द महान और शक्तिप्रदायक होता है। इसलिए जिसने विश्राम (समाधि) के आनन्द का स्वाद चखा है उसके लिए कर्म का आनन्द बहुत तुच्छ है। हम जो भी कर्म कर रहें हैं वे इसीलिये कर रहें हैं ताकि हमें गहरा विश्राम मिल सके। कर्म करना हमारी प्रणाली का एक हिस्सा है। फिर भी सच्चा आनन्द समाधि में मिलता है। गहरे विश्राम को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सक्रिय होना पड़ेगा। दोनों के उचित संतुलन का होना आवश्यक है। अधिकांश लोग आनन्द इधर उधर ढूँढते रहते हैं परन्तु बुध्दिमान् व्यक्ति केवल मस्कुराता है। केवल ज्ञान में ही असली विश्राम है।

गलतियाँ

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 313
12 जुलाई, 2001
लेक ताहो, केलिफॉरनिया
यूनाईटेड स्टेट्स

गलतियाँ
गलतियाँ हमेशा होती रह्ती हैं. तुम उनसे अक्सर परेशान होकर उन्हें सुधारना चाहते हो. तुम कितना सुधार सकते हो? दो परिस्थितियों मैं तुम औरों की गलतियों को सुधारते हो -
1. तुम किसी की गलती को सुधारते हो क्योंकि वह तुम्हें परेशान करती है। लेकिन तुम्हारे सुधारने से भी काम नहीं बन पाता है।
2. तुम किसी की गलती को सुधारते हो ताकि उस व्यक्ति का विकास हो सके, और इसलिये नहीं कि उससे तुम्हें परेशानी हो रही है।

गलतियाँ सुधारने के लिये तुम्हें प्रेम और अधिकार की आवश्यकता है. प्रेम और अधिकार एक दूसरे से विरोधाभासी प्रतीत होते हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है. बिना प्रेम के अधिकार से घुटन होती है और काम नहीं बनता. बिना अधिकार का प्रेम छिछला है. एक दोस्त में दोनों प्रेम और अधिकार की आवश्यकता होती है परन्तु दोनों को सही मात्रा में होना चाहिये. वह तब सम्भव होगा जब हम पूर्णत: वैराग्य में होंगे व केन्द्रित होंगे.

जब तुम गलतियों को हो जाने की अनुमति देते हो, तब तुम दोनों अधिकारपूर्ण व मधुर हो सकते हो. दिव्यता का यही स्वरूप है – दोनों का सही संतुलन. कृष्ण और जीज़स में दोनों थे. जब लोगों में प्रेम होता है तब वे एक दूसरे पर अधिकार जमाते हैं. हरेक सम्बन्ध में अधिकार और प्रेम होता है.

अभय – पति प्रेम करता है और पत्नि के पास अधिकार होता है. माइकी – क्या यह एक गलती है ? गुरूजी – मुझे इसे नहीं सुधारना है. (हँसी)

माँ का सपना सच हुआ - डा0 कैथरीन कोमाण्डा

डॉ0 कैथरीन कोमाण्डा, पी.एच.डी., संयुक्त राज्य अमेरिका में विश्व धर्मों के अध्ययन की प्रोफ़ेसर है।

मेरी माँ हमेशा मुझे बताया करती थी कि बचपन से ही मुझ पर एक फ़रिश्ते की कृपा दृष्टि है। मैं उनसे अक्सर वह कहानी सुनाने को कहा करती थी, जिसमें यह 'फ़रिश्ता' उनसे मिलने आया और उनका सारा भय हर ले गया।
मेरी माँ के लिये उनकी गर्भावस्था बहुत कष्टदायी थी। उस दौरान वे अधिकतर बीमार ही रही, और अंत में उनके साथ एक कार दुर्घटना हो जाने के कारण उन्हें बिस्तर से उठने तक को मना कर दिया गया। डॉक्टरों को डर था कि शायद मैं जीवित इस दुनिया में न आ सकूँ। मेरी माँ भय व चिंता के कारण ठीक से सो भी नहीं पाती थीं। एक रात उनका कमरा एक सुनहरे प्रकाश से भर गया और एक दिव्य आकृति उनके सामने प्रकट हुई। माँ बताती थी कि उन्होंने सफ़ेद रंग के ढीले वस्त्र पहने हुए थे, उनके बाल लंबे और काले थे, और उनके एक दाढ़ी भी थी।
पर माँ के अनुसार उस दिव्य पुरूष में जो सबसे मनोहर थी वह थी उनकी ऑंखें। माँ ने कभी भी इतनी सुंदर ऑंखें नहीं देखी थीं। वे बिना कुछ कहे ही, उन ऑंखों से मानो सारी सृष्टि का प्रेम माँ पर न्यौछावर कर गए। प्रेम की उन लहरो ने माँ का सारा भय धो दिया। माँ हमेशा कहती थीं कि उन्हें लगता था कि वे दिव्य पुरुष शायद जीसस थे, पर वे जो भी थे, माँ उन्हें कभी भूल नहीं पायी और उस घटना के बाद, आज तक, उन्हें जीवन में किसी भी बात का भय न रहा।

जब मैं उन्नीस वर्ष की थी और कॉलेज में पढ़ती थी, तब मैं गुरुजी से मिली। मेरी माँ सोचने लगी कि शायद मैं किसी विचित्र धार्मिक पंथ में शामिल हो गयी हँ और वे मुझको लेकर काफ़ी चिंतित रहती थीं। जब मैं अपनी साधना करती थी तो उन्हें लगता था कि मेरे कमरे से अजीब सी आवाज़ें आ रही हैं और वे दूर से, मेरे कमरे मे रखी हुई गुरुजी की फोटो को देखतीं और सोच में पड़ जातीं कि, पता नहीं यह कौन संत हैं। एक समय आया, उन्हें कैंसर हो गया, तब उन्होंने मुझसे जानना चाहा कि मेरे गुरु कौन हैं, क्या सिखाते हैं और कैसे दिखते हैं। जब मैंने उन्हें उनका चित्र दिखाया तो वे रो पड़ीं। मैंने उनसे पूछा क्या बात है तो उन्होंने उत्तर दिया, ''यह वहीं दिव्य पुरुष हैं जो तुम्हारे पैदा होने से एक रात पहले मेरे पास आये थे।''

रहस्यमय स्थल
कई हर्ष पूर्ण वर्ष बीत गये। एक समय ऐसा आया जब मुझे लगने लगा कि संस्था तो बहुत बड़ी हो गयी है, पंरतु साथ ही साथ संगठन औपचारिक होता जा रहा है जिससे व्यक्तियों के बीच के घनिष्ठ संबंध कम हो रहे हैं। मैं अपने को अलग-थलग महसूस करने लगी। मैं हमेशा शिकायतें करती रहती थी।

उस साल, गर्मी में, गुरुजी कैलिफ़ोर्निया में थे, और बर्कले में सार्वजनिक सभा करने वाले थे। अपनी नकारात्मक भावनाओं के चलते मैं वहाँ गुरुजी से मिलने भी नहीं गई। फिर मैंने सुना कि गुरुजी सैन जोज़ जाने वाले थे। मैंने अपने आप से कहा कि मैं उनसे मिलने नहीं जाऊँगी। आश्चर्यजनक रूप से, अगली सुबह बिना कुछ सोचे-समझे, मैं बस गाड़ी में बैठी और चल पड़ी। मैंने लंबा रास्ता लिया और खिली धूप, समुद्र की लहरो व पहाड़ियों का आनन्द लेती हुई वहाँ पहुँची। शहर में दाखिल होते ही मुझे एकदम से एहसास हुआ कि मैं तो यह भी नहीं जानती की गुरुजी कब और कहाँ सभा करने वाले हैं। न ही मेरे पास कोई फ़ोन नंबर था। मेरे वहाँ ट्रैफ़िक भी बहुत थी और मुझे चिंता होने लगी कि गुरुजी को कहाँ ढूंढूँ। मेरे अंदर सहज ही एक प्रार्थना ने जन्म लिया, तभी एक कार मेरे बगल से निकली जिसमें भारतीय मूल के लोग सवार थे। मैंने सोचा शायद ये लोग मुझे किसी भारतीय दुकान का पता बता दें जहाँ गुरुजी के कार्यक्रमाें का पोस्टर या कार्यक्रम का समय लगा हो। जैसे ही मैंने यह सोचा, वैसे ही अचानक मुझे उनके डैश बोर्ड पर सूर्य की किरणों से चमकता हुआ गुरुजी का चित्र दिखाई पड़ा। बस, मैंने अपनी कार उन लोगों के पीछे लगा दी और उसके बाद ही मस्ती शुरू हो गयी। मैंने देखा कि हाईवे पर कई गाड़ियाँ मुझे हटाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं। तब मैंने थोड़ा ध्यान से देखा कि यह जाँबाज़ ड्राईवर तो हमारे अपने भक्तगण हैं (जब गुरुजी कार से यात्रा करते है, तो बाकी लोगों में गुरुजी की गाड़ी के साथ अपनी गाड़ी लगाने की होड़ लगती है।) मैं अनजाने में ही उस होड़ में शामिल हो गयी थी। मुझे लगा कि जिस कार के पीछे मैं हँ क्या उसी में गुरुजी हैं ? वह कार हाईवे छोडकर घने जंगल में बने एक कच्चे रास्ते पर जाने लगी और मैं भी पीछे चली गई। जब काफ़िला रुका तब मैं अपनी गाड़ी से निकल कर पेड़ो के बीच भागी और एक खुली जगह पर आ कर रुक गई। गुरुजी वहाँ एक तख्ती के नीचे खड़े थे जिस पर लिखा था 'गुप्त स्थल' (द मिस्ट्री स्पॉट)। वे एक बड़ी सी मुस्कान के साथ बोले ''तुम सड़क पर मिली थी'' मैंने आश्चर्य से पूछा ''आपको तो उत्तर से दक्षिण जाना था और मुझे आप दक्षिण से उत्तर जाते हुए मिले'' गुरुजी हँस कर बोले कुछ बातें बस रहस्य ही है। बाद में मुझे पता चला कि उस दिन सुबह उठ कर गुरुजी ने अपना पहले निष्चित किया रास्ता बदल दिया था। रास्ते में उन्होंने एक गलत मोड़ ले लिया था और फिर उन्हें हाईवे पर वापस लौटने के लिये दक्षिण से उत्तर की ओर आना पड़ा। वहीं पर मेरी कार 'अनंत' से टकराई और उसके बाद मैंनें कभी भी शिकायत नहीं की।

आवाज़ जो आई नहीं - श्री प्रकाश एन

श्री श्री प्रकाश एन, त्रिवेन्द्रम के एक कम्प्यूटर व्यवसायी है। आजकल यह सॉफ्टवेयर निर्यातक हैं इसके पूर्व के.एल.एम (रॉयल डच एयरलान्इस में) सूचना प्रबंधक रह चुके हैं।

केरल के वेनद में आयोजित दिव्य सत्संग में भाग लेने व गुरुजी से मिलने हम चारों सड़क मार्ग से गये। कार्यक्रम के अंतिम दिन हम वहाँ से लौटने के लिये सुबह ही चले, क्योंकि यात्रा तेरह घंटे की थी। जाने से पहले गुरुजी के दर्शन करने की इच्छा से हम लोग प्रात: काल लगभग 6:50 पर उनके कुटीर पहुँच गये। दरवाजा बंद था। हम पास ही खड़े प्रतीक्षा करने लगे। तभी मेरी छोटी बेटी निवेदिता जोर से बोली '' देखो - गुरुजी '' गुरुजी हमारे पीछे खड़े थे। उन्होंने पूछा ''क्या तुम वापस जा रहे हो ? गाड़ी सावधानी से चलाना'' यह कहकर वे वहाँ से ऐसे निकल गये मानो ग़ायब हो गये हों।

सफ़र करते करीब नौ घंटे बीत चुके थे। सूरज आम के वृक्षों को छूता हुआ डूब रहा था। मैं अपने विचारों में खोया हुआ था। इस मनमोहक दृश्य के बीच में, एक जुलूस हमारी ओर बढ़ रहा था। हमारी गाड़ी को एक गली की ओर मोड़ दिया गया। उस गली में भी लोग भरे हुए थे। भीड़ उत्तेजित होने लगी। हमारी गाड़ी उस जाम में सबसे आगे थी। मेरे मन ने कहा कि मैं वहीं रुक जाऊँ पर मैं गाड़ी को आगे बढ़ाता चला गया। तभी एक युवक एक बड़ा सा डंडा लेकर गाड़ी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने डंडे को बोनट पर ज़ोर से मारा। पर कोई आवाज़ नहीं हुई, डंडे ने गाड़ी को छुआ तक नही। भीड़ अचानक साफ़ हो गई और मैंने गाड़ी का एक्सेलेरेटर दबाया और आगे बढ़ गया।

यात्रा
मुझे नहीं पता, ऐसे कितने लोग हैं, जिन्होंने मेरी तरह अति दरिद्रता से सम्पन्नता का अनुभव किया है। मैं एक मेहनती, किंतु विद्रोही, अभिमानी व नास्तिक स्वभाव का व्यक्ति था।

मैंने स्वामी चिन्मयानन्द, भगवान रजनीश, दीपक चोपड़ा इत्यादि को अपने खाली समय में सुनने व पढ़ने की चेष्टा की। दिसम्बर 1998 में मुझे 'बैंग ऑन द डोर' जो मेरी पत्नी चिन्मयी ने खरीदी थी, पढ़ने का अवसर मिला। इस पुस्तक से मैं बहुत प्रभवित हुआ और मुझे लगा कि इसका लेखक बहुत बुध्दिमान व ज्ञानी है।

अगले सप्ताह, जनवरी 1999 में मैंने समाचार पत्र में एक छोटा सा विज्ञापन देखा कि ''आर्ट ऑफ लिविंग कोर्स आज से।'' मैंने पत्नी से कहा कि मैं यह कोर्स अवष्य करूंगा। मैं जानना चाहता था कि इतना विलक्षण व बुध्दिमान व्यक्ति मुझे जीने की कला कैसे सिखायेगा ? मैं जब एयरलाइन्स में था तब मैंने कई व्यक्तित्व विकास के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। लेकिन इस 6 दिन के कोर्स का हर एक दिन अद्भुत था। कोर्स ने मेरे जीवन में एक स्थायी बदलाव किया व जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया। मैं 'सामान्यत: क्रोधित और तनावग्रस्त' न रहकर 'सामान्यत: प्रसन्न' रहने लगा।

कोर्स करने के तीन सप्ताह के भीतर मैं आश्रम में एडवांस्ड कोर्स करने पहुँच गया। वहाँ गुरुजी भी थे। मैं उनसे मिला और पहली बार मुझे जो अनुभव हुआ उसे शब्दों में 'उन्मुक्त प्रेम' ही कहा जा सकता है। उनकी सादगी, निर्दोष भाव, प्रेम, सब कुछ शब्दों के परे था। मैंने घर लौटकर ऐसा अनुभव किया, मानो मैं स्वर्ग से लौट कर आया हूँ। लौटने के बाद मेरे व्यापार में व्रिद्धि होने लगी। मुझे अपने परिवार (मेरी पत्नी व दो बेटियॉ, गायत्री और निवेदिता ) के साथ बिताने के लिये समय मिलने लगा और, शादी के 18 वर्षो के बाद घर स्वर्ग बन गया।

मैं अगस्त 1999 में बेसिक कोर्स (अब पार्ट-1 कोर्स) का प्रशिक्षक बन गया और अब मैं गुरुदेव का निमित्ता हूँ। 6 दिन में उनकी कृपा से कैसे कोर्स में आये हुए लोगों का दु:ख दूर हो जाता है, यह देखकर आश्चर्य होता है। और जैसे-जैसे मैं शिविरों में अधिक से अधिक समय देता जाता हँ, मैं एक विचित्र बात का अनुभव करता हँ - मेरे व्यवसाय में व्रिद्धि, तथा मेरे कार्यभार में अत्याधिक कमी। मेरी ज़िम्मेदारी श्री श्री ने ले ली है। जीवन ज्वरता व व्यर्थ चेष्टाओं से मुक्त हो गया है।

स्मृति के खेल
दिसम्बर 1999 में मैंने गुरुजी से कहा कि मुझसे सहजता से घ्यान नहीं होता। कई महीने बीत गये, और मैं इस बात को भूल गया। एक साल के बाद, मैं उनसे कोट्टायम के सत्संग में मिला। जब मैं उनके कमरे से बाहर जा रहा था, उन्होंने मुझे रुकने का इशारा किया और रघु जी मेरे लिये गुरुदेव के घ्यान की सी.डी. लेकर आये। जो व्यक्ति हर सप्ताह हज़ारो लोगों से मिलते हैं, जो विश्व भर का भ्रमण करते हैं- वे हम सबकी छोटी-छोटी आवश्यकताओं का कितना ख़याल रखते हैं।

ऐसा माना जाता है कि अध्यात्मपथ पर अग्रसर होने के लिये हमें अपने दायित्वों से मुँह मोड़ना पड़ता है। परंतु मैं तो संसार में रहते हुए तथा अपने सभी दायित्वों का निर्वाह करते हुए श्री वृध्दि, स्वास्थ्य वृध्दि, आनन्द वृध्दि या कहें तो सर्व समृध्दि का प्रतिपल अनुभव कर रहा हँ।