June 29, 2009

माओवादी मुद्दा : "वार्ता और आध्यात्मिक शिक्षा ही हल है" - श्री श्री


माओवादी मुद्दा : "वार्ता और आध्यात्मिक शिक्षा ही हल है" - श्री श्री

बंगलूरू. 23 जून, 2009. केन्द्र के द्वारा माओवादियों पर प्रतिबंध पर प्रतिक्रिया देते हुए आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक पूज्य श्री श्री रविशंकर ने आज कहा, "माओवादीयों पर प्रतिबंध लगाने से शायद कोई मदद नहीं मिलेगी. उनकी विचारधारा का सामना वार्ता, प्रेरणा और सबसे महत्वपूर्ण रूप से आध्यात्मिक शिक्षा से किया जा सकता है. किसी को आतंकवादी घोषित करने से हम अपने कृत्यों को सही साबित कर देते हैं पर उनकी मानसिकता में बदलाव नहीं आ पाता."

स्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा, "आध्यात्मिक शिक्षा के अभाव की कारण ही माओवाद की वृद्धि हुई है. अधिकांश माओवादी हिन्दु हैं. दुर्भाग्य से, उन्हें अपने ही आध्यात्मिकता के विषय में किसी ने शिक्षा नहीं दी जिसके कारण वे हिंसा के रास्ते पर निकल पड़े. "

युवाओं में आध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा, "धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, हमने अपनी शिक्षा से पूरी तरह से आध्यात्मिक सामग्री को समाप्त कर दिया है. भारत जिससे पश्चिम देश भी आध्यात्मिकता सीखते है उसी देश को आध्यात्मिक शिक्षा की कमी की वजह से नक्सलवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है".


इस संदर्भ में उन्होंने सरकार को सभी सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में आध्यात्मिक शिक्षा शुरू करने के लिए आग्रह किया, जो बच्चों को सभी धर्मों के सुन्दर पहलुओं को उजागर करे तकि च्चे सभी धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रति सम्मान रख सकें.

तिहरे ग्रहण



ट्रिपल ग्रहणों की श्रंखला जुलाई'09 से प्रारम्भ - दुनिया के लिए इसका क्या अभिप्राय है?

बंगलूरू. 22 जून, 2009.

कुछ ही समय बाद विश्व एक दुर्लभ खगोलीय घटना का साक्षी होगा. जुलाई 2009 की शुरुआत से श्रृंखला से तीन तीन ग्रहण लगेंगे. पहला 7 जुलाई, 2009 को चन्द्र ग्रहण लगेगा , फिर उस के बाद 22 जुलाई, 2009 को सौर ग्रहण लगेगा और अंत में चंद्र ग्रहण 6 अगस्त, 2009 को लगेगा. अगले दशक से 2020 तक ऐसे 6 और ट्रिपल ग्रहण लगेंगे.


दुनिया के लिए इस खगोलीय घटना का क्या मतलब है? क्या यह खगोलीय घटना हमारे लिए कुछ संकेत देती है? लेखक दम्पति डी.के. हरि और डी.के.हेमा हरि ने उनकी किताब - "क्या इतिहास दोहराएगा? जुलाई 2009 के ट्रिपल ग्रहण मंगल या अमंगल?" की समीक्षा के दौरान इस सवाल पर विचार विमर्श किया.

भारत के प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान की सोच की सम्मिश्रित व सर्वांगीण विचारधारा का प्रयोग करते हुए लेखकों ने आने वाले त्रिग्रहणों की एक समग्र दृष्टिकोण से विवेचना करी है.

अपने त्रिग्रहणों पर प्रकाश डालते हुए श्री डी.के.हरि ने कहा कि, "पहला त्रिग्रहण जो 3067 BCE में अभिलिखित हुआ था वह कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के साथ मेल खाता है. दूसरा त्रिग्रहण जो 3031 BCE में हुआ उसके साथ ही द्वारका नगर का विनाश हुआ था. अभी हाल ही में 20 वीं सदी की पहली छमाही में 1910 और 1945 के बीच तीन त्रिग्रहणों की श्रृंखला हुई हुई जो प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों व जापान में हुए परमाणु बम विस्फोट के साथ मेल खाते हैं"

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी जिनकी आर्ट ऑफ लिविंग संस्था यह पुस्तक प्रकाशित कर रही है ने कहा कि, “विश्व में सभी वस्तुओं का परस्पर सम्बन्ध है. सभी का असर सब पर होता है. स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत आपस में सभी सम्बन्धित हैं. कारण और फल के इस सिद्धांत के विश्लेषण से जीवन में एक नया आयाम खुल जाता है."

तो जुलाई 2009 में जब यह ट्रिपल ग्रहण लगेंगे तो इनका क्या प्रभाव पड़ेगा?

भारत के लिए यह एक चिंता का विषय है कि वह ऐसे राष्ट्रों से घिरा हुआ है जो आज आंतरिक राजनीतिक संघर्ष का सामना कर रहे हैं जैसे - पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका. डी.के. हरि और हेमा हरि ने कहा कि पहले ग्रहण के शुरुआत के साथ इन संघर्षों का असर भारत तक पहुँचने की संभावना है.

लेखकों ने प्रदर्शित करा कि प्राचीन भारतीय समाज की राजनीति अपरिहार्य युद्ध और संघर्ष की स्थिति का सार समझ कर कैसे उनक सामना करती थी.

दुनिया के आपदा प्रबंधन क्षमताओं के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने यह उत्तेजक प्रश्न उठाया कि जिस प्रकार से प्राचीन सभ्यताएँ प्राकृतिक या मनुष्य द्वारा बनायी गयी आपदा की स्थिति में बड़े पैमाने पर परागमन का सामना कर लेते थे क्या आज के राष्ट्र उतने ही खुले दिल व दिमाग से बिना जातीय, धार्मिक, और राजनीति भेदभाव के शरणार्थीयों को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं?

लेखकों ने इस संघर्षपूर्ण अवधि के दौरान में उत्पन्न आशा की किरण और सकारात्मक सोच के उद्भव की सम्भावना पर भी प्रकाश डाला जो इस जुलाई 2009 के त्रिग्रहण के साथ प्रकट हो सकते हैं.

"यह पृथ्वी उस अनंत आकाश का एक हिस्सा है” – इस सरल किंतु गहन कथन ने इस सत्य को प्रकट करा कि हम सब प्रकृति के अंश हैं और आगे बढ़ने का रास्ता यही है कि हम अपने विचार, कर्म और जीवन शैली में प्रकृति की भूमिका को समझें और अपने जीवन और कर्मों को प्रकृति के अनुरूप ढालें.

डी.के.हरि और हेमा हरि के काम की प्रासंगिकता पर टिप्पणी देते हुए श्री श्री ने कहा, "हालांकि खगोल विज्ञान व ज्योतिष विज्ञान घटनाओं के विज्ञान का अध्ययन है, उसका उपाय आध्यात्मिकता है. जबकि खगोल विज्ञान / ज्योतिष विज्ञान मनुष्य की बेबसी का संकेत देती है, आध्यात्मिकता उसके भीतर की शक्ति को प्रकाश में लाती है."

May 24, 2009

सम्मान और आधिपत्य

साप्ताहिक ज्ञानपत्र  322 
24 सितम्बर, 2001 
बंगलौर आश्रम 
भारत    

जिसके प्रति तुम्हारा आधिपत्य होता है प्राय: उसके प्रति तुम्हारा आदर नहीं रहता। जो कुछ हम हासिल कर लेते हैं प्राय: उसके प्रति हमारा सम्मान क्षीण हो जाता है, यह हमसे अनजाने में ही होता है। 

जिसका तुम आदर करते हो वह तुम से बड़ा हो जाता है। जब तुम में अपने सभी सम्बन्धों के प्रति सम्मान होता है तब तुम्हारी अपनी चेतना का विस्तार होता है। तव छोटी छोटी चीज़ें भी बड़ी और महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। हर तुच्छ जीव गरिमापूर्ण प्रतीत होता है। हर सम्बन्ध के पीछे जो सम्मान होता है वही उस सम्बन्ध को बचा पाता है। 

जब तुम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रति सम्मान रखते हो तब तुम्हारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सामंजस्य होता है। तब तुम्हें इस ब्रह्माण्ड की किसी भी चीज़ का परित्याग या अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती।   

जो भी तुम्हें मिला है उसका सम्मान करने से तुम लोभ, ईर्ष्या और कामवासना से मुक्त हो जाते हो। जीवन के हर पल का आदर रखने का कौशल बनाओ।

May 23, 2009

हार और जीत

आज,  भारत में एक नई सरकार बनी है. इस नई सरकार के लिए दो सलाह हैं: 


पहली सलाह उनके लिये जो जीत गये हैं – उन्हें सोचना चाहिये कि 'हम जीत गए, लोगों ने हम पर भरोसा किया है, तो हमें विनम्र होना चाहिए.' विनम्रता बढ़ाएँ. जो लोग हार गये उनको प्यार से देखें. उनके साथ हमदर्दी रखें. युद्ध के समय एक अलग स्थिति होती है : आप लड़ाई लड़ो । लेकिन जब युद्ध खत्म हो गया तब स्थिति भिन्न हो जाती है.  दुश्मन को गले लगाओ. घावों पर मलहम लगाओ.

अब जो हार गये उनके लिये सलाह। जब तुम हारते हो तब तुम जो चाहते हो वह नहीं होता. तब फिर कई विकल्प उत्पन्न होते हैं-

कुंठा 
अवसाद 
क्रोध 

ये तीन विकल्प तुम्हें सही रास्ते पर जाने से रोकते हैं, जिसके कारण तुम्हें नुकसान होता है. 
चौथा विकल्प है कि, 'यह भगवान की इच्छा है.' इस तरह, हम बुरी भावनाओं से छुटकारा पा जाएंगे, और सकारात्मक  कार्य में लग जाओ. मन को शांत कर कुछ रचनात्मक कार्य में खुद को संलग्न कर लो. अवसादग्रस्त होकर कुछ नहीं मिलेगा. अन्यथा न तो स्वयं की प्रगति होती है और न ही है समाज की. 
हारी हुई पार्टी को यह सोचना चाहिए कि  'हमने अपनी पूरी कोशिश करी,  लेकिन जो होना था, सो हुआ.’ 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:,  अपने कर्म के फल की अपेक्षा किये बिना अपना कर्तव्य करो. जो भी फल मिले उसको स्वीकार करो - भूतकाल के प्रति समर्पण की भावना ही सच्चा समर्पण है. सच्चा समर्पण भगवान पर फल फूल चढ़ाना नहीं है. भगवान के लिए अतीत के कचरे का समर्पण असली समर्पण है. भगवान इस कचरे को  फूलों और फल में बदल देते हैं. 
इसलिए, भूतकाल पर गुस्सा मत हो, अवसाद में मत जाओ. नफरत का कोई मतलब नहीं है, और कुछ नहीं करने का भी कोई मतलब नहीं है. बुद्धिमानी की निशानी है कि समर्पण करके आगे बढ़ें. 
यह हर देश में होता है. जंग होती है, कोई जीतता है और कोई हारता है. 
जो जीते उन्हें अधिक विनम्रता दिखानी चाहिए, और अधिक सम्मानजनक होना चाहिये . उन्हें विश्वास करना चाहिए कि: 'दूसरी पार्टी इसलिये हारी ताकि हमें खुशी मिले.' यदि वे इस तरह से सोचते हैं, तो वे अपने खुशी-दाता को अपमानित नहीं करेंगे और हारे हुए का सम्मान करेंगे. 
भगवान जानते हैं कि किसे कहाँ पर रखें. भगवान का निर्णय स्वीकार करो. लोगों को इस तरह से सोचना चाहिए. जीत और हार जीवन का हिस्सा हैं. इस पद्धति को पहचान कर इसके ऊपर उठना ही विकास की निशानी है. 

April 12, 2009

क्रिया और प्रतिक्रिया

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 263
27 जुलाई, 2000
यूरोपियन आश्रम
जर्मनी

क्रिया और प्रतिक्रिया

किसी भी क्रिया को हम चेतन मन से निर्णय लेकर करते हैं। जबकि प्रतिक्रिया आवेश में होती है। आवेशपूर्ण कृत्यों से कर्मों की लड़ी बनने लगती है। प्रतिक्रिया और निष्क्रियता दोनों से ही कर्म बनते हैं। सजगतापूर्ण क्रियायें कर्म के परे होती हैं। सजगता के साथ किये गये कृत्य से नये कर्म नहीं बनते हैं जबकि निष्क्रियता से कर्म बन जाते हैं। 

उदाहरणस्वरूप युद्ध में सैनिक या पुलिस वालों के अश्रुगैस के उपयोग से उनके कर्म नहीं बनते जबकि आवश्यकता पड़ने पर यदि डॉक्टर मरीज़ को दवाई न दे तो उससे कर्म बनेगा। 

ज्ञान व भक्ति द्वारा तुम कर्मातीत होकर मुक्त हो जाओ।

अपना वोट अवश्य डालें- श्री श्री रवि शंकर जी

"आप जागेंगे तो देश जागेगा"

चाणक्य ने कहा "समाज की दुर्दशा के लिए दुर्जन की दुर्जनता से ज्यादा सज्जन की निष्क्रियता काम करती है."

पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी का आवाहन है देश की जनता के लिए, " एक आतंकवादी देश को बर्बाद करने के लिए समय, धन, और जान देता है | आप देश को आबाद करने के लिए क्या दे सकते हैं? और कुछ नहीं तो हम लोग वोट तो दे सकते हैं."

"धूप, हवा, पानी, धरती इनके साक्षी हम बनेंगे और भारत में बदलाव लायेंगे"

सांस लें तो धर्म के लिए छोडें तो देश के लिए