October 25, 2008

दिवाली ज्ञान के प्रकाश का उत्सव

दिवाली ज्ञान के प्रकाश का उत्सव - श्री श्री रवि शंकर

दिवाली, जिसे सम्पूर्ण विश्व में प्रकाश के त्योहार के रूप में जाना जाता है, बुराई पर अच्छाई की, अन्धकार पर प्रकाश की तथा अज्ञान पर ज्ञान की  विजय का त्योहार है। आज के दिन घरों में रोशनी न केवल सजावट के लिये होती है, किंतु यह जीवन के अथाह सत्य को भी अभिव्यक्त करती है। प्रकाश अन्धकार को मिटा देता है, और जब ज्ञान के प्रकाश से आपके अंदर का अंधकार मिट जाता है, आप में अच्छाई बुराई पर विजय प्राप्त कर लेती है।

वैसे तो इस उत्सव से संबंधित बहुत सी गाथाएं हैं, दिवाली मुख्यत: प्रत्येक ह्रदय में ज्ञान के प्रकाश को प्रज्जवलित करने के लिये मनायी जाती है, प्रत्येक घर में जीवन, प्रत्येक मुख पर मुस्कान लाने के लिये मनायी जाती है। दिवाली शब्द दीपावली का लघु रूप है, जिसका शाब्दिक अर्थ है प्रकाश की पंक्ति।  जीवन के बहुत से पहलु तथा स्तर होते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप उन सभी पर प्रकाश डालें क्योंकि यदि आपके जीवन का एक भी पहलु अंधकारमय होगा तो, आपका जीवन कभी भी पूर्णत: अभिव्यक्त नहीं हो सकेगा।  इसलिये दिवाली में दीपों की पंक्तियाँ प्रज्जवलित की जाती हैं कि आप को ध्यान रहे कि आपके जीवन के प्रत्येक पहलु को आपके ध्यान की तथा ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता है। 

आपके द्वारा प्रज्ज्वलित प्रत्येक दीप, सद्गुण का प्रतीक है। प्रत्येक मनुष्य में सद्गुण होते हैं। कुछ में धैर्य होता है, कुछ में प्रेम, शक्ति, उदारता, अन्य में लोगों को संगठित करने की क्षमता होती है। आप में स्थित अप्रकट मूल्य दिये के समान हैं। जैसे ही वह प्रज्जवलित हो जाएँ, जागृत हो जाएँ, दिवाली है। केवल एक ही दीप जला कर संतुष्ट न हों; हज़ार दीप प्रज्जवलित करें। यदि आप में सेवा भाव है, केवल उससे ही संतुष्ट न हों, अपने में ज्ञान का दीप जलाएँ, ज्ञान अर्जित करें। अपने अस्तित्व के सभी पहलुओं को प्रकाशित करें।

दिवाली का एक और गूढ़ रहस्य पटाखों के फूटने में है। जीवन में आप कई बार पटाखों के समान होते हैं, अपनी दबी हुई भावनाओं, हताशा तथा क्रोध के साथ फूट पड़ने के लिये तैयार। जब आप अपने राग, द्वेष, घृणा को दबाए रखते हैं वह फूट पड़ने की सीमा पर पहुँच जाता है। पटाखे फोड़ने की क्रिया का प्रयोग हमारे पूर्वजों द्वारा, लोगों की बाधित भावनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिये, एक मनोवैज्ञानिक अभ्यास के रूप में किया गया। जब आप बाहर विस्फोट देखते हैं तो आप अंदर भी वैसी संवेदनाओं का अनुभव करते हैं। विस्फोट के साथ बहुत सा प्रकाश निकलता है। जब आप अपनी दबी हुई भावनाओं से मुक्त होते हैं तब आप खाली हो जाते हैं तथा आप में ज्ञान के प्रकाश का उदय होता है।

ज्ञान की सभी जगह आवश्यकता है। यदि परिवार का एक भी व्यक्ति अंधकार में है, आप खुश नहीं रह सकते। अत: आप को अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य में ज्ञान का प्रकाश स्थापित करना होगा। इसे समाज के प्रत्येक सदस्य तक ले जाएँ, पृथ्वी के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाएँ।

जब सच्चा ज्ञान उदित होता है, उत्सव होता है। अधिकतर उत्सव में हम अपनी सजगता अथवा एकाग्रता खो देते हैं। उत्सव में सजगता बनाए रखने के लिये, हमारे ऋषियों नें प्रत्येक उत्सव को पवित्रता तथा पूजा विधियों से जोड़ दिया है। इसलिये दिवाली भी पूजा का समय है। दिवाली का आधात्मिक पहलु, उत्सव में गाम्भीर्य लाता है। प्रत्येक उत्सव में आध्यात्म होना चाहिये क्योंकि आध्यात्म के बिना उत्सव छिछला होता है।

उत्सव चेतना का स्वभाव है तथा उत्सव का प्रत्येक कारण अच्छा है। उत्सव में आप केवल नाचे गाएं नहीं, बल्कि स्वयं को ज्ञान के प्रति भी सजग रखें। जो ज्ञान में नहीं हैं उनके लिये वर्ष में एक बार ही दिवाली आती है, किंतु जो ज्ञानी हैं उनके लिये प्रत्येक दिन, प्रतिक्षण उत्सव है। ज्ञानी बनें तथा अपने जीवन के प्रत्येक क्षण, प्रत्येक दिन को उत्सव बना लें।  

October 24, 2008

प्रेम और अधिकार

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 318
16 अगस्त, 2001
बैंगलौर आश्रम
भारत

प्रेम और अधिकार
प्रेम और अधिकार एक दूसरे के पूर्णतः विपरीत मूल्य हैं फिर भी वे एक साथ विद्यमान रहते हैं। चेतना जितनी अधिक स्थूल होती है अधिकार उतना ही अधिक प्रबल दिखता है। चेतना जितनी अधिक परिष्कृत और सूक्ष्म होती है अधिकार के प्रयोग की उतनी ही कम आवश्यकता होती है। जब तुम स्थूल होते हो, तुम अधिकार की माँग करते हो, और अधिकार माँगने से प्रेम कम हो जाता है। अधिकार जमाना प्रेम और आत्मविश्वास की कमी का द्योतक है। अधिकार की भावना जितनी प्रबल होगी तुम उतने ही कम संवेदनशील और प्रभावशाली होगे। एक समझदार व्यक्ति कभी भी अपने अधिकार की माँग नहीं करेगा... बल्कि अपने अधिकार को पहले से मान कर चलेगा। (हँसी) सबसे प्रभावशाली सी.ई.ओ. अपने अधिकार को कभी महसूस नहीं होने देते क्योंकि अधिकार से अंतरप्रेरणा कभी भी प्रस्फुटित नहीं होती।
तुम्हारे बॉस के मुकाबले एक ईमानदार नौकर का तुम्हारे ऊपर अधिकार कहीं अधिक होता है, है न? एक शिषु का अपनी माँ के ऊपर पूर्ण अधिकार होता है। इसी प्रकार एक भक्त का परमात्मा के ऊपर पूरा अधिकार होता है, हालांकि वह कभी भी उसका प्रयोग नहीं करता।
अत: तुम जितने अधिक सूक्ष्म होगे उतना ही ज्यादा अधिकार तुम्हें प्राप्त होगा। प्रेम जितना अधिक होगा अधिकार उतना ही सूक्ष्म होगा। प्रेम जितना कम होगा अधिकार उतना ही अधिक प्रबल होगा।

दो परिप्रेक्ष्य से गुरु

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 317

9 अगस्त, 2001

यूरोप आश्रम, बैड एन्टोगास्ट

जर्मनी

 

दो परिप्रेक्ष्य से गुरु

पूर्वी संस्कृति के देशों में, गुरु का होना एक गर्व का विषय माना जाता है। गुरु प्रेम और सुरक्षा के प्रतीक हैं और एक बड़ी सम्पत्ति के द्योतक हैं। गुरु का सानिध्य अपने आत्म तत्व के साथ रहने के तुल्य माना जाता है। जिनके पास गुरु नहीं हैं उनको निम्न दृष्टि से देखा जाता था और उन्हें अनाथ, दरिद्र और अभागा समझा जाता था। संस्कृत में अनाथ माने जिसका नाथ न हो। जिनके गुरु नहीं होते थे उन्हें अनाथ कहा जाता था, न कि उन्हें जिनके माता-पिता नहीं होते।

 

परन्तु पश्चिम संस्कृति के देशों में मास्टर का होना शर्म की बात है और दुर्बलता का प्रतीक है, क्योंकि वे लोगों को अपने आधीन दास बनाने के लिये जाने जाते हैं।

 

पूर्वी संस्कृति में गुरू का होना गर्व समझा जाता है और जीवन के हरेक पहलु में गुरु हैं - धर्म के लिए धर्मगुरु, कुल के लिए कुलगुरु,  राज्य के लिए राजगुरु, किसी विषय के अध्ययन के लिए विद्यागुरुऔर आध्यात्म के लिए सद्गुरु. पूर्वी संस्कृति में गुरु आपको शक्तिशाली महसूस कराते हैं; जबकि पश्चिमी संस्कृति में मास्टर आपको कमज़ोर बनाते हैं। पूर्वी संस्कृति में एक अपनेपन की गहरी भावना होती है जो व्यक्ति को अपनी सीमित पहचान घुलाकर अनन्त के साथ एक होने के सक्षम बनाती है। परन्तु पश्चिमी संस्कृति में गुरु एक प्रेरक और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला समझा जाता है।

कौन किसको खुश कर रहा है?

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 316

2 अगस्त, 2001

यूरोप आश्रम, बाद एन्टोगास्ट

जर्मनी

 

कौन किसको खुश कर रहा है?

परमात्मा ने इस संसार और मनुष्य की संरचना बड़ी विविधता और अच्छी चीज़ों के साथ करी है।  मनुष्य के मनोरंजन के लिए और उसे खुश करने के लिए परमात्मा ने अनेक प्रकार की सब्जियाँ, सुगन्ध, फूल और काँटे, राक्षस और भयानक दृश्य बनाए हैं। 

परन्तु मनुष्य तो और भी अधिक अवसादग्रस्त होता गया। तब फिर परमात्मा को सख्त होना पड़ा और मनुष्य ईश्वर को खुश करने में जुट गया। और इस तरह ईश्वर को प्रसन्न रखने में मनुष्य व्यस्त हो गया, और इसमें ज्यादा खुश रहने लगा क्योंकि उसके पास चिन्ता और तनाव के लिये समय ही नहीं बचा। 

इसलिये, अगर  तुम्हारे पास कोई खुश रखने के लिये है तब तुम सतर्क रहते हो और् तुम अधिक खुशी महसूस करते हो। परन्तु यदि तुम्हारा ध्येय केवल अपने आपको खुश रखना हो तब निश्चय ही तुम अवसादग्रस्त हो जाओगे। आनन्दभोग बस और अधिक लालसा को ले आता है। परन्तु समस्या यही है कि हम सुखों के द्वारा तृप्त होने की चेष्टा करते हैं। सच्ची तृप्ति केवल सेवा के माध्यम से ही मिल सकती है।

September 27, 2008

नवरात्रि: स्रोत की ओर एक यात्रा


पूज्य श्री श्री रविशंकर द्वारा

नवरात्रि का त्योहार अश्विन(शरद) की शुरुआत में और चैत्र (वसंत) की शुरुआत में प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यह काल आत्म निरीक्षण और अपने स्रोत की ओर वापस जाने का समय है. परिवर्तन के इस काल के दौरान, प्रकृति भी पुराने को झड़ कर नवीन हो जाती है; जानवर सीतनिद्रा में चले जाते हैं और बसंत के मौसम में जीवन वापस नए सिरे से खिल उठता है।
वैदिक विज्ञान के अनुसार, पदार्थ अपने मूल रूप में वापस आकर फिर से बार बार अपनी रचना करता है। यह सृष्टि सीधी रेखा में नहीं चल रही है बल्कि वह चक्रीय है, प्रकृति के द्वारा सभी कुछ का पुनर्नवीनीकरण हो रहा है - कायाकल्प की यह एक सतत प्रक्रिया है. तथापि सृष्टि के इस नियमित चक्र से मनुष्य का मन पीछे छूटा हुआ है । नवरात्रि का त्यौहार अपने मन को वापस अपने स्रोत की ओर ले जाने के लिए है।
उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्रोत की ओर यात्रा करता है। रात को भी रात्रि कहते हैं क्योंकि वह भी नवीनता और ताज़गी लाती है। वह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों पर राहत देती है – स्थूल शरीर को, सूक्ष्म शरीर को, और कारण शरीर को। उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है, मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुद्धता आती है और बातूनी मन शांत होता है, और ध्यान के द्वारा अपने अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर हमें आत्मसाक्षात्कार मिलता है।
यह आंतरिक यात्रा हमारे बुरे कर्मों को समाप्त करती है। नवरात्रि आत्मा अथवा प्राण का उत्सव है जिसके द्वारा ही महिषासुर (अर्थात जड़ता), शुम्भ-निशुम्भ (गर्व और शर्म) और मधु-कैतभ (अत्यधिक राग-द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है। वे एक दूसरे से पूर्णत: विपरीत हैं, फिर भी एक दूसरे के पूरक हैं। जड़ता, गहरी नकारात्मकता और मनोग्रस्तियाँ (रक्तबीजासुर), बेमतलब का वितर्क (चंड-मुंड) और धुँधली दृष्टि (धूम्रलोचन्)को केवल प्राण और जीवन शक्ति ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है।
नवरात्रि के नौ दिन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रह्मांड में आनन्दित रहने का भी एक अवसर है। यद्यपि हमारा जीवन इन तीन गुणों के द्वारा ही संचालित है, हम उन्हें कम ही पहचान पाते हैं या उनके बारे में विचार करते हैं। नवरात्रि के पहले तीन दिन तमोगुण के हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुण के और आखिरी तीन दिन सत्त्व के लिये हैं। हमारी चेतना इन तमोगुण और रजोगुण के बीच बहती हुई सतोगुण के आखिरी तीन दिनों में खिल उठती है। जब भी जीवन में सत्व बढ़ता है, तब हमें विजय मिलती है। इस ज्ञान का सारतत्व जश्न के रूप में दसवें दिन विजयदश्मी द्वारा मनाया जाता है।
यह तीन मौलिक गुण हमारे भव्य ब्रह्मांड की स्त्री शक्ति माने गये हैं। नवरात्रि के दौरान देवी माँ की पूजा करके, हम त्रिगुणों में सामंजस्य लाते हैं और वातावरण में सत्व के स्तर को बढ़ाते हैं।
हालांकि नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनायी जाती है, परंतु वास्तविकता में यह लड़ाई अच्छे और बुरे के बीच में नहीं है। वेदांत की दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है। जैसा अष्टावक्र ने कहा था, बेचारी लहर अपनी पहचान को समुद्र से अलग रखने की लाख कोशिश करती है, लेकिन कोई लाभ नहीं होता। हालांकि इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है, लेकिन उनके बीच भासता अलगाव की भावना ही द्वंद का कारण है। एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवन्त है जैसे बच्चों को सबमें जीवन भासता है ठीक उसी प्रकार उसे भी सब में जीवन दिखता है। देवी माँ या शुद्ध चेतना ही सब नाम और रूप में व्याप्त हैं। हर नाम और हर रूप में एक ही देवत्व को जानना ही नवरात्रि का उत्सव है। अतः, आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के द्वारा जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है।
काली माँ प्रकृति की सबसे भयानक अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है, फिर भी उसका एक भयानक रूप भी है। इस द्वैत यथार्थ को मानकर मन में एक स्वीकृति आ जाती है और मन को आराम मिलता है।
देवी माँ को सिर्फ बुद्धि के रूप में ही नहीं जाना जाता, लेकिन भ्रांति के रूप में भी; वह न सिर्फ लक्ष्मी (समृद्धि) हैं, वह भूख (क्षुधा) भी और प्यास (तृष्णा) भी हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में देवी माँ के इस दोहरे पहलू को पहचान कर एक गहरी समाधि लग जाती है। यह पच्छम की सदियों पुरानी चली आ रही धार्मिक संघर्ष का भी एक उत्तर है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के द्वारा अद्वैत सिद्धि प्राप्त करी जा सकती है अथवा इस अद्वैत चेतना में पूर्णता की स्थिति प्राप्त करी जा सकती है।

September 21, 2008

चित्र का कमाल - हसन हेलिलियन

हसन एक बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक हैं । युवावस्था में वे ईरान में क्रांतिकारी थे। बाद में वे कैनाडा चले गये और वहाँ टैक्सी चलाते हैं।

सारा दिन काम करने के बाद मुझे, सुबह सुबह एक ग्राहक मिला। उसे काफ़ी दूर तक यात्रा करनी थी पर वह केवल पचास डॉलर ही देने को तैयार था। मैंने उसे बताया कि ऐसा करना मेरे लिये सम्भव नहीं था और मुझे मीटर तो चालू करना ही पड़ेगा। वह उस समय मान तो गया, पर जैसे ही हम लोग हाईवे पर पहुँचे, वह मुझे गालियाँ देने लगा। मुझे गुस्सा आ गया और मैंने गाड़ी रोक दी। वह एक पल के लिये शांत हो गया, फिर उसने बंदूक निकाली और कहा ''मैं तुम्हे गोली मार सकता हँ, तुम्हे जान से मार सकता हँ, मुझसे गड़बड़ न करो।''

एक पल के लिये तो मैं भय से जड़ हो गया। मुझे अपने माथे पर पसीने की बूंदें व सीने में जकड़न का एहसास हुआ। तभी मेरे मन में एक दृढ़ भावना उठी कि मुझे कोई हानि नहीं पहुँच सकती, क्योंकि मेरे गुरु हमेशा मेरे साथ हैं। मैंने मन ही मन एक प्रार्थना की।

वह आदमी मुझ पर लगातार चिल्ला रहा था, तभी उसकी निगाह डैश बोर्ड पर गुरुजी के चित्र पर पड़ी। वह मन ही मन कुछ बुदबुदाया और फिर शांत हो गया। कुछ समय बाद उसने मुझसे पूछा ''यह आदमी कौन है?''। मैं मुड़ा और सीधा उसकी आँखों में देखा, फिर बोला ''यह मेरे गुरु हैं।'' अचानक ही वह नरम पड़ गया, उसने अपने हाथ जोड़े और पहले चित्र को फिर मुझको प्रणाम किया। उसने यह कई बार किया और बोलता रहा ''मैं बहुत शर्मिन्दा हँ।'' गंतव्य पर पहँच कर उसने न केवल मुझे पूरा किराया दिया बल्कि, मुझे काफ़ी बख्शीश भी दी।

September 19, 2008

धड़कन चलती रही............ -डॉ. रमोला प्रभु

मेरीलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरीका की डॉ. रमोला प्रभु (एम.डी.) सुदर्शन क्रिया के प्रभावों पर होने वाले चिकित्सा अनुसंधानों से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।

एक बार गुरुजी दोपहर में वांशिगटन से लॉस ऐंजिलीस जाने वाले थे। मेरे पति गणेश को भोर के समय गुरुजी के साथ क्रिया करने की अनुमति मिल गयी थी जिसे लेकर वे काफ़ी उत्साहित थे। डरते हुए उन्होंने पूछा कि क्या वे गुरुदेव के दिल की धडकन को क्रिया के दौरान नाप सकते है ? उन्होंने आधे घंटे तक, क्रिया के दौरान, गुरुजी के दिल की धड़कन मापी और बाद में मशीन को गुरुजी के शरीर से अलग कर गाड़ी में रख दिया, क्योंकि सभी लोग हवाई अड्डे जा रहे थे। शाम को मैंने उनसे सुबह के परीक्षण के विषय में पूछा तो पता चला कि वे मशीन को कमरे में ही भूल आये थे। वे भागे-भागे दफ़तर गये और उनके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही जब उन्होंने देखा कि मशीन तब भी चल रही थी, मानो गुरुजी से अभी भी जुड़ी हुई हो। तभी अचानक, ठीक सात बजे, मशीन बंद हो गई।
जब गणेश ने क्रिया के दौरान गुरुजी की धड़कन का ग्राफ देखा तो पाया कि गुरुजी को धड़कन पहले 40 फिर 20 प्रति मिनट की दर पर आ गई थी और अंत में 20-30 सेकंडो तक तो शून्य हो गई (बंद हो गई)। तीन बार ऐसा हुआ कि क्रिया के दौरान 20-30 सेकंड के लिये गुरुजी की धडकन बंद हो गई। गणेश ने उत्साहित हो कर गुरुजी को अपने एक मित्र के मोबाइल पर फ़ोन करके पूछा कि सात बजे क्या हुआ था ? गुरुजी हँसे और बोले ''अरे, सात बजे मैं लॉस एंजिलीस पहँचा था।''

रहस्यमय व्यक्ति:-
मेरा प्रतिदिन अब जीवन के चमत्कारों से भर गया है। अच्छी तरह याद है वे दिन जब मेरा जीवन आषारहित व दु:ख से भरा था। उस समय बर्फ पर फिसल जाने से लगी चोट से मुझे अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में चिंतन करने का समय मिला। मैंने निष्चय किया कि मुझे अपने व्यस्त जीवन से कुछ विश्राम लेना होगा। उसी दौरान गुरुदेव की षिक्षा से मेरा परिचय हुआ।

मेरा पीठ-दर्द लगभग पूरी तरह से ठीक हुआ और मेरे चिड़चिड़ेपन में काफ़ी कमी आयी। गुरुदेव ने मुझे जीने का एक मकसद व जीवन के हर पक्ष के मूल्य को समझना व उचित सम्मान देना सिखाया। मेरे जीवन का हर क्षण उनके प्रति एक अर्पण बन गया।
यांति और उल्लास से जीवन का हर क्षण चमक उठा। अभी भी मुझे याद है जब न्यू यॉर्क में सुबह चार बजे फ़ोन की घंटी बजी थी। फ़ोन मेरीलैण्ड के दुर्धटना संकाय की एक नर्स का था। उसने बताया कि हमारे बेटे को एक कार दुघर्टना में कनपटी पर बहुत गहरा घाव लगा था और उसका operation करना पड़ा था। नर्स ने हमें विष्वास दिलाया कि हम बड़े भाग्यषाली माता-पिता हैं और अपने बेटे को घर ले जा सकते हैं। हमें तो इस बात पर विष्वास ही नहीं हो रहा था और हम बस काँपते हुए सुनते रहे। मेरे पति और दोनों बेटियाँ जिस दिन हमारे बेटे गोकुल को घर लाए उसी दिन गुरुजी न्यू यॉर्क पधारे।
आष्चर्यजनक रूप से, जिन लोगाें को गुरुजी को लेने आना था उन्हें आने में बहुत देर लगी और मैंने अपने आपको गुरुदेव के साथ हवाई-अड्डे पर अकेला खड़ा पाया, जैसा मैं चाह रही थी इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती उससे पहले गुरुजी बोले ''गोकुल का ऐक्सिडेंट हो गया न ? चिंता न करो, सब कुछ ठीक हो जायेगा।'' मैं तो बस रो पड़ी।
बाद में गोकुल ने बताया कि एक गाड़ी गलत दिषा में उसकी ओर आ रही थी। घना अंधेरा होने के कारण उससे बचाने की कोषिष में वह एक खम्भे से टकरा गया। उसके शरीर का दाहिना हिस्सा पूरी तरह खून से तर हो गया था। जैसे ही वह उठने की कोषिष करता, चक्कर खाकर गिर पड़ता था। तभी कहीं से एक आदमी आया और उसने गोकुल से पूछा कि क्या उसे मदद की जरूरत है ? कोई गाड़ी नहीं, कोई रोषनी नहीं, कोई और आवाज़ नहीं, बस यही आदमी जो मदद की पेषकष कर रहा था। जल्दी ही पुलिस आ गई और गोकुल को हेलिकॉप्टर द्वारा अस्पताल ले जाया गया।
मैंने अगले दिन पुलिस स्टेषन से उस आदमी के बारे में जानना चाहा तो वे बोले कि वहाँ तो कोई भी नहीं था, और किसी ने फ़ोन भी नहीं किया था '' उस अंधकार में वह कौन था जिसने गोकुल की सहायता की ? मुझे तो किसी उत्तर की आवष्यकता नहीं थी और गुरुजी की मेरे परिवार के ऊपर कृपा पर मेरे विष्वास की पुष्टि हुई।

रोगों का उपचार:-
कुछ वर्ष पूर्व मेरी चाची के गले में एक बहुत बडा टयूमर हो गया। डॉक्टरों को समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी जड़ कहाँ है, जिससे उन्हें पूरे शरीर में रेडियेषन व कीमोथेरेपी करवानी पड़ी। डॉक्टरों ने उन्हें जीने के लिये केवल 6 महीने का ही समय शेष है, ऐसा बताया। मेरे चाचा और चाची ने यूरोप में अपने पोते-पोतियों के साथ कुछ समय बिताने का निष्चय किया। मैंने उनसे अमरीका में हम लोगों से मिलने आने को कहा। वे बाल्टीमोर आये। उसी दौरान हमारे घर पर एक बेसिक कोर्स शुरू होने जा रहा था। उन दोनों ने वह कोर्स किया। सुदर्षन क्रिया के दौरान मेरी चाची गले में जलन की षिकायत करती थीं, पर किसी तरह उन्होंनें उस कोर्स को पूरा किया। उसके बाद वे दोनों भारत लौट गये। सात साल बीत चुके है, मेरी चाची जीवित और स्वस्थ है और नियमित रूप से क्रिया करती हैं। आजकल वे अपने इलाके के गरीब बच्चों के लिये एक स्कूल चलाती हेैं।
केटी (असली नाम गुप्त रखा गया है), एक महिला जो कि पचास साल के लगभग आयु की हैं, को 'सिस्टेमिक लूपस' की बीमारी थी। लगभग तीस वर्षो से वे इस बीमारी से पीड़ित थीं जिसके फलस्वरूप उनका शरीर जैसे खोखला हो गया था। उनके दोनों गुर्दे खराब हो चुके थे और ऑपरेषन कराके उन्होंने एक गुर्दा प्रतिरोपित कराया था। इसी प्रतिरोपित गुर्दे में उनका जीवन चलता था। उनके शरीर के सभी महत्वपूर्ण जोड़, धातु अथवा प्लास्टिक के अंगो द्वारा बदले गये थे (दोनाें ऐड़ियाँ, दोनाें कूल्हे, दोनों घुटने, दोनों कलाइयाँ)। बाल्टीमोर के शेरटन होटल में जब गुरुजी एक वार्ता दे रहे थे तो केटी उन्हें सुनने वहाँ गई। उसके एक हफ्ते बाद उन्होंने बेसिक कोर्स किया और एक महीने बाद कैनडा में गुरुदेव के सान्निध्य में एडवांस्ड कोर्स भी किया। इससे उन्हें कुछ लाभ अवष्य हुआ होगा क्योंकि इसके बाद उन्हाेंने बहुत से एडवांस्ड कोर्स किये और फिर एक डी.एस.एन. कोर्स भी किया। समकालीन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यदि देखा जाये तो केटी को दी जाने वाली दवाआें के साइड इफेक्ट से ही उन्हें पंगु होकर बिस्तर पकड़ लेना चाहिये था। परंतु गुरु कृपा व नियमित साधना से वह आज काम पर जाती है और एक भी सत्संग नहीं छोड़ती हैं।
डॉन नामक एक व्यक्ति को धूम्रपान व मद्यपान की बुरी लत थी। वे किसी की भी बात नहीं सुनते थे और अपनी लत नहीं छोडते थे। एक दिन गॉल्फ खेलते वक्त उन्हें एक बड़ा दौरा पड़ा और वे वहीं गिर गये। उसके बाद वे अपनी नौकरी छोड़ अपनी पत्नी व जवान बेटे के साथ कैलिफ़ोर्निया में रहने आ गये। कुछ महीनाें बाद उन्हाेंने फ़ोन करके कहा कि वे उस ''साँस वाली चीज़'' को सीखना चाहते हैं। उनके आधे शरीर को लकवा मार चुका था और वे किसी तरह अपनी पत्नी के साथ कोर्स करने पहुँचे। कुछ सप्ताह बाद डॉन ने फ़ोन करके बताया कि वे चलने लगे हैं। इसके एक महीना बीतने के बाद डॉन की पत्नी ने फ़ोन किया, उनकी खुषी की सीमा न थी। डॉन ने धूम्रपान और शराब छोड़ दिये थे, वे फिर से गॉल्फ खेलने लगे थे।