January 26, 2009

गणतंत्र दिवस पर - उस भारत के लिए - जो सपने देखता है तथा निर्भय है ।

उस भारत के लिए - जो सपने  देखता है तथा निर्भय है

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा

धर्मिक आतंकवाद, नक्सलवाद तथा प्रकृतिक आपदाओं की बढ़ती त्रासदियों के बीच भी भारत प्रगतिशील है । कैसे चल पा रहा है भारत? भारत का जन्म धार्मिक टकराव, हिंसा तथा अवसाद के बीच हुआ । संसार में कभी भी धर्म से एकता नहीं आयी है । फिर भी इन धार्मिक तथा सांस्कृतिक विभिन्नताओं के बीच भी भारत की निरंतर बढ़ती शक्ति का क्या कारण है ।

इस शताब्दि में चीन बल के ज़ोर पर एक रहा है जबकी भारत की एकता का कारण उसकी संस्कृति तथा आध्यात्म हैं । हालांकि पिछले कुछ दशकों में, धार्मिक कट्टरता, जातीय हिंसा, नक्सलवाद तथा प्राकृतिक आपदाओं ने भारत को हिलाया है, इसके बावजूद इसकी आध्यात्मिक मूल्य के बल पर टिकी हुई अखण्डता और सहिष्णुता पूरे विश्व को साफ दिखने लगी है ।

स्वतंत्रता, आध्यात्म तथा ऐसी राष्ट्रीयता जो सभी का सम्मान करती है के मूल्य सदैव ही भारत ने अपनाये हैं । यह संसार की प्राचीनतम सभ्यता है । जब अमेरिका की खोज नहीं हुई थी तथा यूरोप में अंधकारमय  युग था, भारत की ख्याति सभी जगह फैली हुई थी । भारत अपनी कला, वास्तु, आध्यात्म तथा व्यापार के लिए विख्यात था ।

बीती हुई शताब्दियों में भारत ने बहुत सी चुनौतियों का सामना किया है तथा उन पर विजय पाई है । इक ओर भारत ने न्याय तथा समानता के शिखर को छूआ है तथा एक ओर दलितों का दमन भी हुआ है । जहाँ भारत अहिंसक तथा सौम्य लोगों का देश रहा है वहाँ सती जैसी कुप्रथाएँ भी प्रचलित रही हैं । बीच की राय न होते हुए भारत के बारे में लोगों की या तो बहुत ही अच्छी राय है अथवा बहुत ही निकृष्ठ क्योंकि यह विपरीत मूल्यों से भरा हुआ है ।

शताब्दियों से भारत के सकारात्मक पहलुओं की आपेक्षा नकारात्मक स्वरूप का अधिक प्रचार किया गया है । सौभाग्य से अब यह बदल रहा है । अनेक भाषाओं, तथा जातियों में विभाजित तथा शताब्दियों के दमन से प्रभावित यह देश आत्मसंशय में लिप्त रहा है । जैसे कि कोई हाथी जो बड़े से बड़ा पेड़ तो उखाड़ सकता है, किंतु महावत के अंकुश से डरा रहता है, भारत भी कभी कभी भयभीत हो जाता है । पश्चिम ने भी भारत को एक सोया हुआ महाकाय बताया है ।

विश्व की एक छटवीं जनसंख्या के साथ इसे पहले ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा लेनी चाहिए थी । अब इसे विश्व के पटल पर अपना उचित स्थान ले लेना चाहिए । ऐसा होने के लिए इसके देश वासियों को अपनी संस्कृति, आध्यात्मिक मूल पर और अधिक विश्वास तथा गर्व करना होगा । आतंक तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के लिए और अपने युवा मन को हिंसा की ओर बढ़ने से रोकने के लिए हमें अपने आध्यात्मिक मूल्यों को प्रसारित तथा पोषित करना होगा । नक्सल्वाद के मूल कारणों को संबोधित करना होगा तथा भ्रमित युवाओं को मुख्य धारा में लाना होगा । हमें सीखने तथा नवीनीकरण के लिए खुला मन रखना होगा न कि पश्चिमी उपभोगवाद एवं भौतिकवाद का अंधानुकरण

आज हमें :-

१.     शिक्षा को रोज़गार मूलक करना होगा।

२.     राजनीति से भ्रष्टाचार तथा कदाचार को मिटाना होगा ।

३.     युवाओं को सामाजिक विकास में रुचि लेने के लिए शिक्षित तथा प्रोत्साहित करना होगा ।

४.     कृषि क्षेत्र की ओर ध्यान देना होगा, जहाँ एक ओर औद्योगिक विकास हुआ है वहीं कृषि पूर्णतः उपेक्षित रही है ।

५.     स्वच्छता पर ध्यान देना होगा ।

६.     एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाना होगा ।

७.     कन्या भ्रूण हत्या रोकना होगा ।

८.     जल संसाधनों का उचित उपयोग करना होगा।


जिस प्रकार से जनसंख्या बढ़ रही है, इन समस्याओं का समाधान अब भी बहुत दूर है ।

प्राचीन ज्ञान जो कि भारत का मान रहा है लगभग भुलाया जा चुका है, उसके पुनर्स्थापना की आवश्यकता है ।

हमें उस भारत के लिए कार्य करना होगा जिसमें हिंसा, आतंक की कोई जगह नहीं हो, निर्धन को सहयोग तथा न्याय दोनों हो, मध्यवर्ग, भय तथा असंतोष से मुक्त हो, सपने देख सके तथा निर्भय हो और समृद्धशालीवर्ग  सामाजिक उत्तरदायित्व लें तथा मानवीय मूल्यों को धारण करें । पूरे विश्व और अपने भले के लिये उस भारत की परिकल्पना करनी होगी जो अपने ज्ञान तथा संस्कृति के श्रेष्ठ पहलुओं को २१वीं सदी के अनुसार ढाल कर आगे बढ़ सके ।

January 21, 2009

पुरुषार्थ और भाग्य

पुरुषार्थ और भाग्य

जब लोग भूतकाल को पुरुषार्थ मानते हैं तो वह आत्मग्लानि व पश्चाताप से भर जाते हैं। जब वे भविष्य को भाग्य मानते हैं तब सुस्ती और जड़ता प्रभावी हो जाती है। ज्ञानी भूतकाल को भाग्य और भविष्यकाल को पुरुषार्थ मानते हैं। जब तुम भूतकाल को नियति मान लेते हो तब और अधिक प्रश्न नहीं उठते हैं और मन को आराम मिल जाता है। और जब तुम भविष्यकाल को पुरुषार्थ मानते हो तब तुम उत्साह और गतिशीलता से भरे जाते हो। बेशक भविष्य को पुरुषार्थ मानने पर कुछ अनिश्चितता होगी और कुछ चिंता भी, लेकिन वह साथ में सतर्कता और रचनात्मकता भी ला सकती है।

 

भूतकाल को भाग्य मानो, भविष्य को पुरुषार्थ मानो, और वर्तमान में दैवत्व देखो।

 

प्रश्न : हम चिंता सॆ बाहर कैसे निकलें ?

उत्तर : दिव्य शक्ति पर विश्वास कर के और साधना करने से।

अरुणाचल दौरा

प्रभात की अरुणिमा में उनकी मुरली की शांति धुन अभी तक मंत्रमुग्ध कर रही है... शीर्षक से एक लोकप्रिय दैनिक पत्र ने परमपूज्य श्री श्री रविशँकर के एक सप्ताह लम्बे दौरे को प्रकाशित किया इस लेख ने भारत के सबसे पूर्वी राज्य में किये गए इस दौरे के भाव को कुशलतापूर्वक चित्रित किया।

इस आगमन के दौरान श्री श्री ने एक समृद्ध एवं शांत अरुणाचल प्रदेश के निर्माण के लिये एक प्रक्रिया प्रारम्भ की जिसमे वहां की स्थानीय जनसंख्या को सम्मिलित किया, विशेषतौर पर युवाओं को। इस सतत विकासशील पहल को क्रियान्वित करने के लिये और राज्य की पारम्परिक संस्कृति एंव प्रोत्साहन करने के लिये एक दीर्घकालिक अंतर दृष्टि प्रदान की।

भारत को भौगोलिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश केवल एक सामरिक महत्व का स्थान रखता है अपितु यहाँ लोगों की मनःस्थिति पर भी विस्मयकारी प्रभाव डालता है।उनके लिये यहाँ उगते सूर्य का प्रदेश भी है। भारत हर सुबह सर्व प्रथम अरुणाचल में ही जागता है।

आगमन के समय जब अरुणाचल प्रदेश की मिश्रित संस्कृति एवं सामांजस्य लिये हुए विविधता , जो तीन देशों की अंतराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा है- म्यामार, भूतन, और चीन परिणमस्वरूप ये न केवल बाह्य दबाव से गुजर र्हा है अपितु आंतरिक  दबाव्से भी ग्रसित है। अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध संस्कृति की सराहना करते हुए श्री श्री ने कहा,पुरातन विश्वास एवं संस्कृति विश्व की धरोहर हैं जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है उन्होंने कहा कि आर्ट ऑफ लिविंग इन्हें न केवल अरुणाचल प्रदेश में अपितु पूरे देश एवं विश्व में लोकप्रिय बनाने के लिये वहां के स्थानीय समुदायों के साथ कार्य करेगा।

इस राज्य में अपने प्रवास के दौरान श्री श्री ने ईटानगर, पासीघाट,और तवांग के अनेक जन आयोजनों में सम्मिलित हुए और सामाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से समपर्क एवं अंतर्वाता की। पासीघाट में श्री श्री ने त्रिदिवसीय- पारम्परिक युवामहोत्सव को सम्बोधित किया और पारम्परिक नेताओं से वार्ता की, कि युवाओं को अपनी जड़ों का सम्मान करना चाहिये न कि उन पर शर्मिन्दा होना चाहिये। वहां के लोगों ने हर कदम पर श्री श्री का पूरी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। अपनी अंतर्वाता के दौरान श्री श्री ने पुरातन विश्वासों को संरक्षित करने एवं विविधताऑं का सम्मान करने की आवश्यकता पर बल दिया।

2 दिसम्बर को गुरूजी ने तवांग की यात्रा की एवं एक बड़े सार्वजनिक समारोह को सम्बोधित किया। श्री श्री ने दृढतापूर्वक कहा की कोई भी ताकत अरुणाचल प्रदेश को भारत से अलग नहीं कर सकती क्योंकि यह उगते सूर्य का प्रदेश भारत का हिस्सा है(चीन पूरे भारत का प्रिय बने और हमसे हाथ मिलाए, नाकि हमसे भूमि के एक टुकड़े को त्याग करने को कहे।)

श्री श्री के सार्वजनिक आयोजनों के दौरान तवांग के ऑफिस और व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने अपने कार्यों को स्थगित करके गुरुजी का महान स्वागत किया। उन्होंने तवांग के बौद्ध स्तूप का दौरा किया और वहां के भिक्षुऑं स अंतर्वाता की। उन्होंने 1962 में चीन के विरुद्ध अपने देश कि रक्षा करते हुए शहीद सैनिकों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि भि अर्पित की।तवांग आगमन के दौरान श्री श्री ने मुख्य मंत्री डोरी खाण्डू से उनके आवास पर एक घंटे लम्बी अत्यंत महत्व्पूर्ण मुलाकात की तत्पश्चात उनके साथ ईटानगर वापस चले गए।

श्री श्री ने ईटानगर में एक अनूठी कार्यशाला का संचालन किया जिसमें लोगों को स्वस्थ, सुखी, एवं अर्थपूर्ण जीवन जीने के रहस्य बताए गए।विभिन्न पृष्ठ्भूमियों के करीब 4000 लोग इस हेल्थ ऐंड हैपिनैस कार्यशाला में सम्मिलित हुए जहाँ श्री श्री ने प्रतिभागियों को प्राणायाम , योग और ध्यान कि शांति पूर्ण दुनिया से परिचित कराया। उन्होंने विस्ड्म ऐंड म्युसिक फौर वन वर्ल्ड फैमिलीनाम के समारोह में भी सम्मिलित हुए।

दौरे के अन्य केन्द्र बिन्दू अरुणाचल प्रदेश और अन्य पूर्वोतर राज्यों से आए करीब 1000 युवाओं के लिये आयोजित प्रशिक्षण कर्यक्रम, युथ लीडरशिप ट्रेनिंग कार्यक्रम था युवाओं ने श्री श्री से वार्तलाप की और एक तनाव रहित हिंसा मुक्त विश्व एवं सम्पूर्ण क्षेत्र के ग्रमों के सतत विकास की अचूक पहल के लिये उनके दृष्टिकोण के कृयांवयन के लिये योजनाओं की रूपरेखा बनाई। श्री श्री ने कहा कि आर्ट ऑफ लिविंग इस क्षेत्र के युवाओं को प्रशिक्षित करने एवं रोजगार प्रदान करने के लितये योजना बना रही है।उन्होंने कहा कि आदिवासी जनजातियों मे से चर्यानित युवाओं के युथ लीडर अथवा युवाचार्य बनने के लिये प्रशिक्षण दिया जाएगा।

अपने प्रवास के दौरान श्री श्री ने अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल जे।जे।सिंह से राज्यभवन मे मुलाकात की। ईटानगर के बिशप जौन थौमस काट्रूकुडिविल को भी श्री श्री ने ईटानगर के जूली बस्ती स्थित आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम मे बुलाया जहां उन्होंने एक घंटे का समय व्यतीत किया।

श्री श्री ने राज्य मे अपने एक सप्ताह लम्बे दौरे की समाप्ति असहिष्णुता के प्रति सहनशीलता न दिखाने की प्रवृति को प्रोत्साहन करने एवं पुरातन संस्कृति को पोषण करने के आवाहन के साथ की।भारत की समंजनशीलता एवं सबसे प्रेम करने का पुराना इतिहास है और इसे हर कीमत पर संरक्षित करने की जरूरत है। उन्होंने ईटानगर छोड्ने से पहले एक प्रेसवार्ता मे कहा।

श्री श्री ने धार्मिक एवं सांस्कृतिक असहनशीलता के बढ़ते स्तर के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हुए, आध्यात्मिकता के आभाव को इसके लिये दोषारोपित किया। हाल ही मे मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले का उल्लेख करते हुए, जिसमे यहूदियों को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया था, उन्होंने कहा कि यहाँ भारत के सहनशीलता के इतिहास पर एक बड़ा धब्बा है; क्योंकि यहूदियों को कभी देश मे पीड़ित नहीं रखा गया है। उन्होंने इस पर खेद व्यक्त  किया कि आज के राजनेता आतंकवाद एवं धर्मोन्मतता के दमन के लिये कुछ कार्य करने के स्थान पर अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिये अधिक चिंतित हैं। पथभ्रष्ट आतंकवादियों से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि वो विविधता को सराहें, उन्होंने कहा भारत विभिन्न रंगों के पुष्पों का गुल्दस्ता है, और इसे नष्ट करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। उन्होंने धार्मिक नेताओं से पथभ्रष्ट तत्वों को शिक्षित करने का आग्रह किया।   

 

विभिन्न विद्यालयों की स्थापना, ऑषधीय वनसपतीयों एवं स्थानीय फलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने, स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित करना एवं ज्ञान के मंदिरों के निर्माण के लिये योजनाएँ चल रहीं है जिसमे 180 बच्चों का स्कूल् भी चल रहा है। ये एक अन्य उदाहरण है कि कैसे श्री श्री विश्व मे भ्रमण करके सतत सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिये परियोजनाऑं को क्रियाशील करते हैं।

January 4, 2009

पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा 2009 में एक समृद्ध जीवन जीने के लिये 7 आसान सूत्र

पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा 2009 में एक समृद्ध जीवन जीने के लिये 7 आसान सूत्र

  1. समय समय पर इस विशाल ब्रह्मांड के सापेक्ष में अपने जीवन को देखो। यह समुद्र में एक बूंद जितना भी नहीं है। बस इतनी सी जागरूकता तुम्हें अपने छोटेपन से निकाल देगी और तुम अपने  जीवन के हर पल को जीने के लिए सक्षम हो जाओगे। 
  1. अपने आप को जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की याद दिलाओ। तुम यहाँ शिकायत करने और भुनभुनाने के लिए नहीं आये हो। तुम यहाँ पर कुछ अधिक बड़ा करने के लिए आये हो। 
  1. सेवा करो! अधिक से अधिक सम्भव सामुदायिक सेवा में शामिल हो जाओ।   
  1. विश्वास रखो कि दिव्य शक्ति तुमसे अत्यधिक प्यार करती है और तुम्हारा ख्याल रख रही है। यह आस्था और विश्वास रखो कि तुम्हारे जीवन के लिये जो कुछ भी आवश्यक है वह तुम्हें ज़रूर मिलेगा। 
  1. जैसे हम कैलेंडर के पन्नों को पलट देते हैं, उसी प्रकार से हमें अपने मन को भी पलटते रहने की जरूरत है। अक्सर हमारी डायरी यादों से भरी हुई रहती है। ध्यान रखो कि तुम अपने भविष्य की तिथियों को अतीत की घटनाओं के साथ न भर दो।  अपने अतीत से कुछ सीखो और कुछ  छोड़ो और आगे बढ़ो। 
  1. और अधिक मुस्कुराओ! तुम्हारा चेहरे पर एक अमिट शर्तरहित मुस्कान सच्ची समृद्धि की निशानी है। 
  1. अपने साथ सैर के लिए कुछ समय निकालो। संगीत, प्रार्थना और मौन से अपने आप का पोषण करो। कुछ मिनट ध्यान, प्राणायाम और योग करो। यह तुम्हें रोगमुक्त करता है और तरोताज़ा करता है, और तुम में गहनता और स्थिरता लाता है।

January 1, 2009

नये साल पर सन्देश

बीते हुए समय से कुछ सीखें, कुछ भूलें : मुक्त हो जाएँ

 

श्री श्री रविशंकर

 

प्रतिवर्ष हम नए साल का स्वागत दूसरों को खुशी तथा सम्पन्नता की शुभकामना देकर करते हैं । सम्पन्नता का चिन्ह क्या है ? समपन्नता का चिन्ह है मुक्ति, मुस्कान तथा जो कुछ भी अपने पास है उसे निर्भय हो कर आस पास के लोगों के साथ बाँटने की मनःस्थिति ।

 

सम्पन्नता का चिन्ह है, दृढ़ विश्वास, कि जो भी मुझे चाहिए वह मुझे मिल जाएगा ।

 

२००९ का स्वागत अपनी आंतरिक मुस्कान के साथ करें । कलैंडर के पन्ने पलटने के साथ साथ हम अपने मन के पन्नों को भी पलटते जाएँ । प्रायः हमारी डायरी स्मृतियों से भरी हुई होती है । आप देखें कि आपके भविष्य के पन्ने बीती हुई घटनाओं से न भर जाएँ । बीते हुए समय से कुछ सीखें, कुछ भूलें और आगे बढ़ें ।

 

आप लोभ, घृणा, द्वेष, तथा ऐसे अन्य सभी दोषों से मुक्त होना चाहते हो । यदि मन इन सभी नकरात्मकताओं में लिप्त है तो वह खुश तथा शांत नहीं रह सकता । आप अपना जीवन आनंदपूर्वक नहीं बिता सकते । आप देखें, कि नकारात्मक भावनाएँ भूतकाल की वजह से हैं और आप अपने भूतकाल को अपने वर्तमान जीवन के अनुभव को नष्ट न करने दें । भूतकाल को क्षमा कर दें । यदि आप अपने बीते हुए समय को क्षमा नहीं कर पाएँगे तो आप का भविष्य दुःखपूर्ण हो जाएगा । पिछले साल, जिनके साथ आप की अनबन रही है, इस साल आप उनके साथ सुलह करलें । भूत को छोड़ कर नया जीवन शुरु करने का संकल्प करें ।

 

इस बार नववर्ष के आगमन पर हम इस पृथ्वि पर सभी के लिए शांति तथा संपन्नता के संकल्प के साथ सभी को शुभकामनाएँ दें ।

 

आर्थिक मंदि, आतंकवाद की छाया तथा बाढ़ तथा अकाल के इस समय में और अधिक निःस्वार्थ सेवा करें । जानें कि इस संसार में हिंसा को रोकना ही हमारा प्राथमिक उद्देश्य है, तथा विश्व को सभी प्रकार की समाजिक तथा परिवारिक हिंसा से मुक्त करना । समाज के लिए और अधिक अच्छा करने का संकल्प लें, जो पीड़ित हैं उन्हें धीरज दें । राष्ट्र के प्रति उत्तरदाई हों ।

 

जीवन का आध्यात्मिक पहलू हममें संपूर्ण विश्व, संपूर्ण मानवता के प्रति और अधिक अपनेपन, उत्तरदायित्व, संवेदना तथा सेवा का भाव विकसित करता है । अपने सच्चे स्वरूप में आध्यात्मिक पहलू जाति, धर्म, तथा राष्ट्रियता की संकुचित सीमाओं को तोड़ देता है तथा सभी को, सर्वत्र व्याप्त जीवन से अवगत कराता है । इस वर्ष अपनी भक्ति को खिलने दें । उसे व्यक्त होने का अवसर दें ।

 

हमें अपने चारों ओर व्याप्त ईश्वर का, उसके प्रकाश का अनुभव करना चाहिए । आप के मन में इसे अनुभव करने की इच्छा होनी चाहिए । क्या आप में कभी यह इच्छा उत्पन्न हुई है - कि आप को उच्चतम शांति प्राप्त हो ? संपूर्ण विश्वश्वरीय प्रकाश से व्याप्त है । जब आप गाते हैं या प्रार्थना करते हैं, उसमें पूर्ण तल्लीनता हो । यदि मन कहीं और उलझा हुआ है, तो प्रार्थना नहीं हो सकती । तुम एक मुक्त पंछी के समान हो । तुम पूर्णतः मुक्त हो । अनुभ्व करो कि तुम एक पंछी के समान उड़ रहे हो । उड़ना सीखो । यह तुम्हें स्वयं ही अनुभव करना होगा । और कुछ नहीं है । यदि तुम अपने को बंधन में महसूस करोगे तो तुम यहाँ ही बंधे रहोगे । मुक्त हो जाओ । तुम मुक्ति का अनुभव और कब करोगे ? अभी मुक्त हो जाओ । बैठो और संतुश्ट हो जाओ । ध्यान तथा सत्संग में कुछ समय बिताएं, ताकि आपमें चुनौतियों का सामना करने की आंतरिक शक्ति विकसित हो ।

 

जब मन तनाव मुक्त होता है, बुद्धि तीक्षण होती है । जब मन, आकांक्षाओं, ज्वर तथा इच्छाओं जैसी छोटी छोटी चीज़ों से भरा हो तब बुद्धि क्षीण हो जाती है । और जब बुद्धि तथा ग्रहण क्षमता तीक्षण नहीं होते, जीवन पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं होता, नये विचार नहीं बहते तथा क्षमताएँ दिनोंदिन लुप्त होने लगती हैं । इस समझ के साथ अपने कदम छोटे मन से बाहर निकलो और यह कदम आपके जीवन की बहुत सी समस्याओं का समाधान कर देगा । सहज रहो, प्रेम पूर्ण रहो । आपने आप को सेवा में लगाओ । आपने जीवन का उत्सव मनाओ ।

 

December 29, 2008

वासन्थी

वासन्थी

       एक प्रतिष्ठित आय्यन्गर परिवार की वासन्थी, यू.एन.आई. के ब्यूरो प्रमुख श्री नारायणन की पत्नी हैं। बंगलौर आने से पहले वे कई वर्षों तक सिंगापुर में रह चुकी हैं।

 

क्लिप ग़ायब!

       कुछ वर्ष पहले मुझे ऑपरेषन के द्वारा अपना गर्भाषय निकलवाना पड़ा। जिस डॉक्टर ने ऑपरेषन किया था, उसने ऑपरेषन करने में मेरे गुर्दे को नुकसान पहुँचाया जिसके कारण सर्जरी के बाद भी मेरा दर्द गया नहीं बल्कि तीन महीने में और बढ़ गया। मैंने और अच्छे इलाज के लिये भारत आने का निष्चय किया। यहाँ पर जाँच से पता चला कि पहले वाले ऑपरेषन में डॉक्टर मेरे उदर क्षेत्र में एक छोटा क्लिप छोड़ कर भूल गये थे। यहाँ के डॉक्टरों ने फिर से सर्जरी कर के मेरे उदर क्षेत्र से वह क्लिप निकालने का निष्चय किया। मैंने सोचा कि गुरुजी के जर्मनी से लौटने के बाद उनके दर्षन करने के बाद ऑपरेषन करवाऊँगी।

       मैं सर्जरी के लिये अपने आप को मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी क्याेंकि दर्द बढ़ता ही जा रहा था। मैंने फ़ोन से गुरुजी से बात की और उन्होंने मुझे एक घ्यान करने को कहा। एक सप्ताह बाद, मैं ऑपरेषन से एक दिन पहले अपनी जाँच करवाने गई। अगले दिन गुरुजी लौट आये और अपनी रिपोर्ट लेने से पहले मैं आश्रम में पूजा में चली गई। जब मैं रिपोर्ट लेने पहुँची तो डॉक्टरों को आष्चर्यचकित पाया। वह क्लिप ग़ायब हो चुकी थ्ीा।

भक्ताें के आनन्द :

गुरुजी से मेरा संपर्क 1988 में हुआ। उस समय मैं कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ग्रसित थी, जैसे रीढ़ में कष्ट, स्पॉनडिलाइटिस, साँस की तकलीफ़। हृदय पर इस सब का बहुत दबाव पड़ रहा था और डॉक्टरों ने कहा था कि इस हालत में मैं 6 महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह पाऊँगी। मैं अवसाद की स्थिति में थी और मेरे परिवार की भी चिंता बढ़ रही थी।

       मैं रोज़ श्री कृष्ण भगवान से प्रार्थना करती थी। एक दिन मैं बैठी और प्रार्थना की कि वे अब मुझे ले जायें- मैं 6 महीने भी जीना नहीं चाहती थी। जब मैं प्रार्थना कर रही थी तो मुझे एक दर्षन हुआ। ऐसा लगा जैसे बारिष हुई हो और एक लगभग दस साल का लड़का, सफ़ेद कपड़े पहने हुए, मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाये खड़ा था। मैं एक अंधेरे कुएँ में थी और उस बालक ने अपना हाथ बढ़ाकर मुझसे उसे पकड़ कर ऊपर आने को कहा। मैं उसका हाथ पकड़ने की नाकाम कोषिष कर रही थी, कि उसने दोनों हाथों से मुझे उठा कर ऊपर खींच लिया। मैं इतना हल्का और आनंदित महसूस कर रही थी कि मैंने सोचा कि ईष्वर मुझे यहाँ से ले गये हैं। एक या दो घंटे बाद मैंने अपनी ऑंखें खोली और अपने आप को इसी दुनिया में पाया।

       उस अनुभव के दो दिन के अंदर ही सिंगापुर में भारतीय उच्चायोग के एक कर्मचारी के घर पर एक सत्संग होना था जिसमें मुझे निमंत्रण मिला था। जब मैं वहाँ पहुँची तो ऐसा लगा कि वहाँ लोग किसी की प्रतीक्षा कर रहे थे, किसी योगी की। मैं किसी से बात नहीं करना चाहती थी। दरवाजा खुला और अचानक गुरुदेव बाहर निकले और मैंने सोचा 'कल तो आप मेरे साथ थे, और आज आप यहाँ है।' मुझे अपने अंदर एक अजीब से आनन्द की अनुभूति हुई। मुझे लगा ''यही मेरे कृष्ण है।'' मैं उन्हें अपने बारे में बताना चाहती थी। मै चाहती थी की वे मेरे विषय में तथा मेरे अनुभव के विषय में जाने। सत्संग के दौरान वे किसी बात पर चर्चा कर रहे थे, मेरी तरफ देख कर बोले 'क्यों वासन्ती, समझ में आया ?'

       मेरे लिये बेसिक कोर्स काफ़ी कठिन और कष्टदायी था, पर कुछ समय बाद मुझे अच्छा लगने लगा और शरीर में कुछ बदलाव महसूस हुआ। मैंने अपनी पीठ से बेल्ट व गले से कॉलर हटा दिया जिसके कारण मैं ठीक से साँस लेने लगी। उसके बाद जल्दी ही मैं आश्रम गई और उन्नीस दिन वहाँ रही। गुरुजी की कृपा से मैं उस समय में बिलकुल ठीक हो गयी और बिलकुल नयी होकर लौटी। मैं तृप्त हो गई। मानसिक अथवा किसी भी अन्य स्तर पर, मैं पुरानी वाली वासन्ती नहीं थी। ये मेरे लिये सचमुच एक चमत्कार था।

       गुरुदेव से संपर्क में आने से पहले, शारीरिक स्तर पर मैं ठीक से साँस भी नहीं ले पाती थी, बिलकुल भी नहीं। मैं बहुत अधिक भावुक स्वभाव की थी। मानसिक स्तर पर मुझे अपने संबंधियो के कारण काफी कठिन क्षणों का सामना करना पड़ा था। पर आश्रम में बिताये उन उन्नीस दिनों में मैं पूरी तरह बदल गयी थी। मेरे पति व परिवार वालों ने मुझमें आये इस बदलाव को देखा और फिर वे भी जुड़ गये।

       पहले मैं अपने में ही रहती थी और लोगाें से मिलना पसंद नहीं करती थी। आज मैं विष्व भर में कोर्स लेती हँ। बहुत आष्चर्य होता है यह देख कर कि अब मैं केैसे हर जगह घर जैसा ही अनुभव करती हँ और लोगों से मिलकर मुझे कितनी खुषी होती है। मैं जहाँ भी जाती हँ अपने आपको मार्गदर्ष्ाित व रक्षित अनुभव करती हँ।

       ऑस्टे्रलिया से, हाल ही में कोर्स लेते समय कई लोगों को गुरुजी की उपस्थिति का आभास हुआ। यह बस, आष्चर्यजनक था। पर्थ में एडवांस्ड कोर्स के बाद हम 6 लोग ंकिंग्स पार्क नाम के एक उद्यान में गये। पार्क से आप नीचे बहती हुई 'स्वान' (हंस) नदी की ओर देख सकते हैं। लगभग शाम के 6:30 बजे थे, नदी के ऊपर एक नीली रोषनी थी। हमने सोचा कि यह पानी के ऊपर एक प्रतिबिम्ब है, पर वह बढ़ती रही और हम इस रोषनी को आसमान में भरते हुए देख सकते थे। तभी पानी में हमें श्वेत वस्त्र पहने गुरुजी की छवि उभरती दिखाई दी। हम उनके केष व उनकी ऑंखे देख सकते थे और यह भी कि वह छवि पीछे मुड़ी और हमारी ओर देखने लगी। मन में एक विस्तार हुआ। वह एक गहरा अनुभव था।

       लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं 'उन्हें' किस रूप में देखती हँ, विष्णु, देवी, गणपति, या जीसस, या कुछ और ? मेरे हृदय में दिव्यता के इन सभी स्वरूपों के लिये प्रेम है। यह अभी शक्तियाँ गुरुजी के रूप में एक हो गयी हैं। और मज़े की बात यह है कि आप उन्हें छू सकते हैं, उनसे बात कर सकते हैं, उनकी अनुभूति भी कर सकते हैं । उनके परे कुछ भी नहीं है। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार है।

       जहाँ भी आप जायें, पथ आपके लिये बिछा हुआ है और जीवन बड़ा सरल हो जाता है। यह टीचर होने का एक बड़ा अनुभव है। यह उनके प्रेम की शक्ति है जो आस्था या किसी और भाव से बढ़कर है।

श्री श्री का ईराक के शांति कार्यक्रम में सम्बोधन


श्री श्री ने अपने ईराक शांति कार्यक्रम में कहा - दूसरों के आँसुओं को पोछना हम सभी का कर्तव्य है । 

 

बैंगलोर, दिसंबर २३, २००८.

 

आध्यात्मिक तथा मानवीय मूल्यों के प्रेरक तथा आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता, परम पूज्य श्री श्री रविशंकर राजनैयिक तथा धार्मिक प्रमुखों के साथ अपने शांति कार्यक्रम के अंतर्गत तीन दिन की ईराक प्रवास पर हैं । वह युद्ध से क्षत इस देश में आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा चलाए जा रहे मानवीय कार्यक्रमों का भी अवलोकन करेंगे ।

 

 बगदाद पहुँच कर श्री श्री ने शीया राजनैतिक परिषद के प्रमुख, माननीय हुसैन अल मुसावी से भेंट की । शिया प्रमुख ने श्री श्री से उनके द्वारा चलाए जा रहे, हितकारी कार्यक्रमों को जारी रखने तथा विषेशतः भारत से और अधिक चिकित्सकों को ईराक भेजने का आग्रह किया, जिनकी आज इराक में कमी है । जिसे श्री श्री ने स्वीकार किया ।  संस्था ने २००३ में युद्ध के तत्काल बाद ही बहुत से चिकित्सकों को भारत से भेजा था । श्री श्री ने कहा, ईराक के लोगों ने बहुत त्रासदी सही है । आर्ट ऑफ लिविंग संस्था, लोगों से तनाव कम करने/दूर करने के सहायता कार्यक्रमों को जारी रखेगी, तथा ईराक के लोगों को प्रशिक्षित करेगी जिससे वे सभी सशक्त बनें । हम सभी ईराकियों को आनंदित देखना चाहते हैं ।  

 

तत्पश्चात श्री श्री आर्ट ऑफ लिविंग महिला सशक्तिकरण प्रशिक्षण शिविर गए तथा महिलाओं को सिलाई आदि के प्रशिक्षण के लिए दी जा रही विभिन्न सुविधाओं का अवलोकन भी किया ।

 

शाम को उन्होंने ईराकी राष्ट्रीय काँग्रेस के सभापति तथा ईराक के पूर्व उपप्रधानमंत्री  माननीय अहमद चलाबी के आतिथ्य में आयोजित निजी रात्रिभोज में भाग लिया तथा ईराकी युवाओं की सहायता के लिए विभिन्न उपायों पर चर्चा की । श्री श्री कल महिलाओं तथा युवाओं के सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के लिए, युवा मंत्रालय के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे ।

 

अपने तीन दिन के प्रवास में श्री श्री ईराक के उपप्रधानमंत्री, युवा, स्वाथ्य तथा न्याय मंत्री एवं प्रबुद्ध धार्मिक नेताओं से भी मिलेंगे । वे कर्बला भी जाएंगे जहाँ वे क्षेत्र के राज्यपाल से मिलेंगे ।


मई २००७ में अपनी ईराक यात्रा के दौरान श्री श्री प्रधान मंत्री के अतिथि के रूप में ग्रीन ज़ोन में रहे थे । इस बार उन्होंने रेड ज़ोन में रहने का निर्णय किया ताकि जनसामान्य आसानी से उन्हें मिल सकें ।