August 15, 2009

जन्माष्टमी : सबसे आकर्षक का जन्म - परम पूज्य श्री श्री रविशंकर


जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है । अष्टमी का अर्ध चंद्र महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इस बात का प्रतीक है कि सत्य के भी प्रकट तथा अप्रकट पहलु हैँ जिनमें पूर्ण समन्वय है; प्रकट है पदार्थ संसार तथा अप्रकट है आध्यात्मिक क्षेत्र । इस संसार में लोग चरम की ओर प्रवृत होते हैं। जो पदार्थ जगत की क्रिया कलापों में लिप्त हैं वे जड़ हो जाते हैं, तथा वे जो आध्यात्म में डूबे हैं “अवधूत” हो जाते हैं - अपने आस पास की दुनिया से अनभिज्ञ रहते हैं।

अष्टमी को कृष्ण का जन्म पदार्थ तथा आध्यात्मिक संसार दोनो पर उनके संपूर्ण स्वामित्व को व्यक्त करता है । वह एक महान शिक्षक तथा आध्यात्मिक प्रेरणास्त्रोत हैं तथा साथ ही एक परिपूर्ण राजनीतिज्ञ भी । एक तरफ़ वे योगेश्वर हैं (योग के स्वामी- वह स्थिति जिसे पाने की अभिलाषा सभी योगी रखते हैं) तथा दूसरी तरफ़, वह एक चोर हैं । कृष्ण की सबसे बड़ी निपुणता यह है कि वह एक ही समय में संतों से भी अधिक केंद्रित हैं तथा साथ ही नटखटपने से भरपूर भी ! उनके व्यवहार में दोनों चरम समाहित हैं साथ ही दोनों चरम का पूर्ण संतुलन है । शायद इसीलिए कृष्ण का व्यक्तित्व समझना इतना कठिन है । अवधूत बाह्य संसार के प्रति उदासीन है तथा सांसारिक व्यक्ति, एक राजनेता या एक राजा आध्यात्मिक संसार से अनभिज्ञ है । किन्तु कृष्ण, द्वारिकाधीष तथा योगेश्वर दोनों हैं !

और फिर कृष्ण द्वारा प्रयोग की गई नीतियाँ भी अतुलनीय हैं । किसी भी संत या पैगंबर ने कभी ऐसी नीति प्रयोग नहीं की । कृष्ण का जीवन एकांतवासी साधु का नहीं था वह पूर्णतः कर्मठता से युक्त था । प्रत्येक क्षण घटनाओं से युक्त था, फिर भी सभी घटनाओं से निर्लिप्त । कृष्ण ने दिखाया कि वस्तव में जीवन आनंद है, उत्सव है । केवल कोई कृष्ण ही युद्ध स्थल पर ज्ञान दे सकता है, भोजन, गुण, भक्ति तथा आत्म ज्ञान की बात कर सकता है । और केवल अर्जुन ही उसे समझ सकता है । कल्पना करो कोई हाथ में बंदूक लिए खड़ा हो तथा सत्व, रजस तथा तमस की समीक्षा कर रहा हो । केवल ब्रह्म में स्थित व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है क्योंकि सभी घटनाओं पर उसका नियंत्रण है, या वह सभी घटनाओं के परे है ।

कृष्ण का ज्ञान हमारे समय में बहुत प्रासंगिक है, यह तुम्हें पूरी तरह से पदार्थ में लिप्त होने से रोकता है तथा साथ ही पूर्णतः उससे विमुख भी नहीं करता । यह तुम्हारे जीवन में नई ऊर्जा भर देता है । एक थके हुए तनाव युक्त व्यक्तित्व को अधिक केंद्रित तथा सक्रिय व्यक्तित्व बना देता है । कृष्ण हमें कुशलता युक्त भक्ति का ज्ञान देते हैं । अधिकतर कुशल व्यक्तियों में संवेदनशीलता तथा भक्ति का आभाव होता है तथा सरल तथा श्रद्धावान व्यक्तियों के कार्यों में कुशलता की कमी होती है । कृष्ण के व्यक्तित्व में श्रद्धा तथा कार्यकुशलता के इन विपरीत मुल्यों का श्रेष्ठ संयोजन है । गोकुलाष्टमी उत्सव मनाने का अर्थ है पूर्णतः विपरीत किन्तु एक दुसरे के अनुकूल गुणों को आत्मसाध करना तथा उन्हें जीना ।

कृष्ण का अर्थ है सबसे आकर्षक - आत्म या अस्तित्व । सभी का आत्म कृष्ण है तथा जब हमारे व्यक्तित्व से हमारा सच्चा स्वभाव प्रकट होता है तब, कुशलता तथा संपन्नता स्वयं आने लगती हैं । जैसा कि कृष्ण ने गीता में कहा, वह समर्थ में सामर्थ्य हैं, ज्ञानी में ज्ञान, सुन्दर में सुंदरता तथा गंभीर में गांभीर्य हैं । वह सभी जीवों की जीवन ऊर्जा हैं । और जन्माष्टमी वह दिन है, जब आप कृष्ण के उस विराट स्वरूप को अपनी चेतना में फ़िर से जागृत करते हैं । आपने सच्चे स्वभाव से अपना जीवन जीना ही कृष्ण के जन्म का वास्तविक रहस्य है ।

इस प्रकार जन्माष्टमी मनाने का सबसे सार्थक तरीका है यह जानना कि आप की दो भूमिकाएँ हैं - राष्ट्र का ज़िम्मेदार नागरिक होना तथा साथ ही यह समझना कि आप सभी घटनाओं से परे हैं - निरंजन ब्रह्म । जन्माष्टमी मनाने का वस्तविक तात्पर्य है अपने जीवन में थोड़ा सा अवधूत तथा थोड़ी सी क्रियाशीलता का समावेश करना ।

August 13, 2009

आयुर्वेद स्वाइन फ़्लू का इलाज - श्री श्री

''आयुर्वेद स्वाइन फ्लू का प्रभावकारी मुकाबला कर सकता है'' श्रीश्री

बैंगलुरु, 12 अगस्त 2009, आतंकित न होने के लिये आग्रह करते हुए, द आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी ने एक प्रेस विज्ञप्ति मे कहा '' भारत के पास ''आयुर्वेद के ज्ञान का वैभव है जो स्वाइन फ्लू का मुकाबला कर सकता है''

इस पर विस्तार से चर्चा करते हुए श्री श्री आयुर्वेद केन्द्र के वरिष्ठ आयुर्वेदिक चिकित्सक ड़ॉ मणीकांतन एवं ड़ॉ निशा मणीकांतन ने बताया कि ''स्वाइन फ्लू शरीर मे प्रतिरक्षा के बिगड जाने से आक्रमण करता है । आयुर्वेद सरल और प्रभावशाली उपाय बताता है जो प्रतिरक्षा और प्रतिरोध के निर्माण मे बढ़ोत्तरी करता है । लक्ष्मी तरु ( वनस्पति शास्त्र का नाम -सीमारुबा) की पत्तियो की चाय, तुलसी, ऑवला और अमृत ( गिलोय) प्रतिरक्षा को बढ़ाने का कार्य करते है । इसके अतिरिक्त और वैकल्पिक रुप से अदरक और हल्दी का चूर्ण को नींबू के रस या शहद के साथ दिन मे दो बार लिया जा सकता है ।''

वायु वाहित स्वाइन फ्लू वायरस का मुकाबला करने के लिये सम्बरानी धूप (लोभान की ड़ंठल) को दिन मे दो बार जलाना चाहिये । सम्बरानी बहुत शक्तिशाली वायुमंडलीय निष्कीटक होता है, यह भी चिकित्सको ने कहा ।

श्री श्री ने यह भी कहा '' इसके अतिरिक्त, हमारा मन प्रतिरक्षा मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । जब भी हम आतंकित और भय मे होते है तो हमारा प्रतिरक्षा कर स्तर निचे चला जाता है । प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास हमे शांत रखने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । अखिल भारतीय आर्युविज्ञान ( एम्स, नई दिल्ली), राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान(नीमहंस, बैंगलुरु) मे स्वतंत्र शोध के अनुभव पता चलता है कि प्राण्ाायाम और ध्यान जैसे अभ्यास प्रतिरक्षा मे तीन गुना बढ़ोत्तरी करते है । यदि हम इन अभ्यासो और सरल आयुर्वेदिक नुस्को का समावेश अपने दिनचर्या मे कर ले तो हम स्वाइन फ्लू का आसानी से मुकाबला कर सकते है ।''

http://www.youtube.com/watch?v=soqjU2k5pdc

August 7, 2009

वापस दिल की ओर

एक बार मछलियों का एक सम्मेलन हुआ, जो वहाँ पर इसलिए एकत्रित हुई थीं कि इस बात पर विचार-विमर्श कर सकें कि उनमें से किसने सागर को देखा है। उनमें से कोई भी यह नहीं कह सकी कि वास्तव में उन्होंने सागर को देखा था। तब एक मछली ने कहा, ''मेरे विचार से मेरे परदादा ने समुद्र देखा था''। एक दूसरी मछली ने कहा, ''हाँ, हाँ मैंने भी इसके बारे में सुना है''। तीसरी मछली ने कहा, ''हाँ वास्तव में उसके परदादा ने सागर देखा था''। फिर उन्होंने एक बड़ा सा मन्दिर बनाया और उस मछली के परदादा की एक मूर्ति स्थापित की। उन्होंने कहा, ''इन्होंने सागर देखा था। वे सागर से जुड़े हुए थे''

ठीक यही बात उन लोगों के साथ भी है, जो साधना के पथ पर चल रहे हैं और दिव्यता को जानने के लिए उत्सुक हैं। दिव्यता क्या है? मैं तुम्हें बताता हूँ। दिव्यता एक हँसी-खेल की तरह से है। यह उसी समुद्र की मछली की तरह से है, जो समुद्र की खोज कर रही है। दिव्यता हमारी आत्मा के केन्द्र में है, अपनी आत्मा के अन्दर जाने और वहाँ से अपना जीवन जीने की तरह से है।

हम सभी इस संसार में भोलेपन का उपहार लेकर आए है, लेकिन धीरे-धीरे जैसे हम अधिक बुध्दिमान होते गए, हमारा भोलापन समाप्त होता गया। हम शान्ति के साथ पैदा हुए और जैसे-जैसे बड़े हुए, हमने अपनी शान्ति खो दी और हम शब्दों से भर गए। हम हृदय से जीते थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, हम हृदय से मस्तिष्क की ओर चले गए। इस यात्रा को विपरीत दिशा में ले जाना ही दिव्यता है। यह अपने मस्तिष्क से हृदय की तरफ की यात्रा है, शब्दों से शान्ति की तरफ तथा हमारी बुध्दिमत्ता के साथ-साथ भोलेपन की तरफ वापसी है। यद्यपि यह बहुत सरल है, लेकिन यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

परिपक्वता की स्थिति प्राप्त करना और किसी भी परिस्थिति में विचलित न होना दिव्यता है। कुछ भी हो, तुम्हारे चेहरे की मुस्कान को कोई भी नहीं छीन सकता है। सीमित दायरे के बाहर जाना और इस बात का अनुभव करना कि इस ब्रह्माण्ड में जो भी कुछ है, वह मेरा है, दिव्यता है।

अदिव्यता को परिभाषित करना आसान है। यह, मैं इस स्थान विशेष का हूँ, कहकर अपने को सीमित करना है। मैं इस संस्कृति का हूँ या मैं इस धर्म का हूँ, कहकर अपने को सीमित करना है। यह उसी तरह से है जैसे बच्चे कहते हैं कि मेरे पिताजी तुम्हारे पिताजी से अच्छे हैं या मेरा खिलौना तुम्हारे खिलौने से अच्छा है। मेरा विचार है कि अधिकांश लोग अभी भी इसी मानसिक आयु से चिपके हुए हैं, जबकि खिलौने बदल चुके हैं। युवक कहते हैं कि मेरा देश तुम्हारे देश से अच्छा है या मेरा धर्म तुम्हारे धर्म से अच्छा है।

एक इसाई कहेगा बाइबिल सत्य है, जबकि एक हिन्दू कहेगा कि वेद सत्य है और वे प्राचीन हैं। मुसलमान कहेंगे, कुरान खुदा का अन्तिम शब्द है। किसी वस्तु को हम केवल इसलिए महिमामयी बताते हैं क्योंकि हम उस संस्कृति के हैं, इसलिए नहीं कि वह क्या है। यदि कोई व्यक्ति उन सभी चीजों की जिम्मेदारी ले सके, जो युगों-युगों से है और यह अनुभव करे कि यह सब मेरा है, तब यह परिपक्वता है। यह मेरी सम्पत्ति है, क्योंकि मैं ईश्वर का हूँ। ईश्वर ने समय और स्थान के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न ज्ञान दिए। कोई भी व्यक्ति पूरे ब्रह्माण्ड का ज्ञाता हो सकता है और कह सकता है कि जितने भी सुन्दर फूल हैं वे सब मेरे उपवन के हैं।

मानव का सम्पूर्ण विकास ''कुछ होने'' से ''कुछ न होने'' की तरफ तथा ''कुछ भी न होने'' से ''सबका होने'' का है। दिव्यता, भोलेपन और बुध्दिमत्ता का एक दुर्लभ संगम है; शान्त रहते हुए उसी समय अपने को व्यक्त करने के लिए शब्दों की क्षमता रखना। उस समय मन पूर्ण रूपेण वर्तमान क्षण में होता है। जो भी आवश्यक है उसका तुम्हें एक प्राकृतिक और अविरल रूप में ज्ञान दिया जाता है, बस तुम शान्त रूप से बैठो और प्रकृति का संगीत तुम्हारे अन्दर से प्रवाहित होता है।

July 7, 2009

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा—भक्तों का दिन

परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी

गुरुपूर्णिमा को गुरु का दिन कहते हैं लेकिन वास्तव मे यह है भक़्त का दिन. यह कृतज्ञता महसूस करने का दिन है, इस सुंदर ज्ञान के लिये जो की तुम्हारे सदगुरु से तुम्हे मिला है. कृतज्ञता महसूस करो कि कैसे इस ज्ञान ने तुम्हे परिवर्तित कर दिया है. कृतज्ञता व विनम्रता से भीतर सच्ची प्रार्थना का उदय ( आविर्भाव) होता है. तीन प्रकार के लोग गुरु के पास आते है—विद्यार्थी, शिष्य व भक्त (श्रद्धालू).

एक विद्यार्थी गुरु के पास आता है, कुछ सीखता है, कुछ जानकारी प्राप्त करता है और स्कूल छोड़ देता है.यह ऐसे ही है जैसे गाइड के पास जाना हो. तुम पर्यट्न- गाइड के साथ कोई पर्यटन – स्थल देखने जाते हो और वह तुम्हे सारे स्थल दिखा देयता है और उनके बारे मे थोड़ी बहुत जानकारी भी दे देता है और फिर तुम उसे धन्यवाद कह देते हो और बात खत्म हो जाती है. विद्यार्थी वह होता है जो केवल जानकारी एकत्रित करता है लेकिन जानकारी ज्ञान नहीं होती और ना ही विवेक होती है.

तब होता है शिष्य, शिष्य-गुरु के पद-चिन्हों पर चलता है लेकिन उसका उद्देश्य होता है ज्ञान हासिल करना और अपने जीवन क सुधार करना. अत: वह केवल जांकारी एकत्रित नहीं करता बल्कि थोड़ा और भीतर तक जाता है. वह अपने जीवन मे परिवर्तन लाना चाहता है और अपने जीवन का कुछ मतलब बनाना चाहता है. वह अपना समय निकालता है, अपनी क्षमता के अनुसार उन्नति करता है और हो सकता है उसे एक न एक दिन प्रबोध हो भी जाए. तब बारी आती है भक्त की. उसका उद्देश्य बोध प्राप्त करना भी नहीं होता. वह तो केवल प्रेम मे डूबा रहता है.उसे तो केवल सदगुरु से, प्रभु से, अन्नता से प्रेम हो जाता है. वह यह चिंता नहीं करता कि उसे बोध प्राप्त हुआ या नहीं. उसे यह भी चिंता नहीं होती कि उसे काफी बुद्धिमता प्राप्त होगई या नहीं.बस वह तो हर पल प्रेम मे डूबा रहता है और उसके लिये यहि काफी होता है. ऐसे भक्त मिलना बहुत मुश्किल होता है. विद्यार्थी तो बहुत होते हैं, शिष्य थोड़े कम होते हैं.लेकिन भक्त कोई विरले ही होते हैं.

भगवान बनना कोई बड़ी बात नहीं है. कोई भी वस्तु तुम चाहो या ना चाहो भगवान ही है.केलिन भक्ती कहीं कहीं ही प्रस्फुटित होती है. जहां ऐसी भक्ति उत्पन्न होती है, वही भक्त है. आकर्षण हर जगह होता है पर प्रेम कहीं कहीं, लेकिन भक्ति तो बहुत हि दुर्लभ होती है.यह बहुत सुंदर चीज है.

एक विद्यार्थी आँखों में आँसू लेकर गुरु के पास आता है और जब जाता है तब भी उसकी आँखों मे आँसू होते है लेकिन यह आँसू थोड़ अलग तरह के होते हैं, ये कृतज्ञता के आँसू होते है,प्रेम के आँसू होते है. प्रेम मे रोना बहुत सुंदर है. जो एक बार भी प्रेम मे रोया है ,वही इसका स्वाद जानता है और जब भी ऐसा होता है तो पूरी सृष्टि इसका आनन्द मनाती है.पूरी सृष्टि एक ही चीज चाहती है और वह है नमकीन आँसुओं को बदल कर मीठा हो जाना.

प्रेम ऐसी चीज है जिसमे विधाता भी आनन्द मानते है. जितना तुम प्रभु को चाह्ते हो, वे भी तुम्हे उत्ना ही चाहते है. प्रभु भी तुम्हरे आने का इंतजार करते हैं.प्रभु भी तुम्हारे नजदीक आने को उत्ना ही उतावले हैं जित्ना तुम उनक पास जाने को. जब भी इस ध्रा पर किसी भक्त का आविर्भाव होता है तो प्रभु बहुत प्रसन्न होते है. इस लिये गुरुपूर्णिमा भक्त का दिन माना जाता है

June 29, 2009

जीवन का ए. बी. सी

सजगता, अपनापन तथा प्रतिबद्धता सफलता की कुँजी है. जीवन का ए. बी. सी. क्या है ? यह सजगता, अपनापन तथा प्रतिबद्धता (Awareness, Belongingness, Commitment) है. किसी भी क्षेत्र मे ए. बी. सी. की आवश्यकता होती है. क्या हम इस बात से सजग हैँ कि हम अपने को क्या बता रहे हैँ? किसी भी समाज के लिये इस स्तर की सजगता महत्वपूर्ण है क्योँकि यह समाज मे अपराध को रोक सकती है. इस स्तर की सजगता से किसी अपराधी को अपराध करने से रोकना सँभव है.

एक चोर था . वह एक सँत से मिलने गया. उसने साधु को बताया उसके मन मेँ चोरी करने कि प्रबल इच्छा है. साधु ने कहा कि मैं तुम्हे चोरी करने से रोकने नहीं जा रहा हूं लेकिन जब चोरी करो तो जागरुकता के साथ करो. तीन माह बाद चोर साधु के पास गया और सजगता से बोला ,”मैं चोरी नहीं कर पाया”.

क्रोध के साथ भी यही बात है. यह एक विस्फोट कि तरह आता है और हम अपना आपा खो देते हैं. परंतु वास्तव में तुमने क्या खोया है? तुमने सजगता खोयी है.तुम क्रोध को उत्तेजित कर सकते हो और वह क्रोध तुम्हे नष्ट करने का आवेग बन सकता है. परंतु स्रृजनकर्ता बनने के लिये तुम्हे आवेग को पैदा करने की आवश्यकता नहीं है, तुम्हे केन्द्रित होने कि आवश्यकता है. और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हे सजग रहने कि आवश्यकता है.

अब, किसी में सजगता कैसे काई जा सकती है? हम जीवन में सरल और छोटी वस्तुओं से प्रार्ंभ करें. ऐसी वस्तुएं जो महत्वहीन लगती हैं , जैसे चिड़ियों को गाते हुए सुनना ,सूर्य अस्त होते हुए देखना और इसी तरह अन्य वस्तुएं ,ये तुम्हारी सजगता बढाएगी.

सजगता, बुद्धिमतता पैदा करती है. अपनत्व ह्र्दय को पोषित करती है और प्रतिबद्धता जीवन को पोषित करती है. समस्या यह है कि बहुत थोड़े सृजनकर्ता हैं. लेकिन उनका बहुत अधिक संकल्प है और वे सफल होते हैं.

यदि हम ए.बी.सी. पर ध्यान देते हैं तो हम समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकते है. स्वयं से प्रश्न पूछो, क्या विश्व के सभी लोग आप के अपने हैं? जिस दिन तुम पूछोगे तुम्हारी अध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ हो जाएगी. सजगता के इस प्रसंग के साथ तुम ब्रम्हांड क विज्ञान समझ लोगे.

कुछ मंदिरोँ मे ‘संकल्प’ नामक प्रथा है.वे तुम्हे इस बात का स्मरण कराते हैं कि यह ब्रम्हांड कितना पुराना है और फिर वहां से तुम्हे इस थल(?) मे ले आते हैं. ब्रम्हांड विज्ञान सजगता लाता है, सजगता बढ़ाने की दूसरी विधियां, प्राणायाम, ध्यान, और श्वसन है. भारत मे 180 से अधिक कम्पनियों मे हमने उनके कर्मचारियों को ध्यान सिखाया है. इससे यह अनुभव हुआ कि उनका भी एक जीवन है.वे घर जाते हैं और अपनी पत्नी और बच्चों के साथ समय बिताते हैं ध्यान सीखने से पहले वे केवल बिस्तर पर चले जाते थे. तुम्हे ऊर्जा की आवश्यकता है और वह तुम्हे केवल भोजन और सोने से नहीं मिलेगा.ध्यान तथा चेतना कि शांत स्थिति भी तुम्हे ऊर्जा प्रदान करेगी. जब्अ भी तुम्हे समय मिले, एक साथ बैठो, गाना गाओ और ध्यान करो. इससे एकजुट होने की भावना बढ़ेगी.

’सी’ कौस्मौलौजी, प्रतिबद्धता तथा दया के लिये है. अधिक मुस्कुराओ, थोड़ा हंसी मजाक विनोद तुम्हे व्यथा से दूर रख सकता है. कर्नाटक तथा महाराष्ट्र मे एक प्रथा है कि वे कलश के साथ एक दर्पण रखते हैं. जो भावनाएं तुम्हे व्यथित कर रहीं हैं वे विलीन और विलिप्त हो जाएंगी. प्रतिदिन दर्पण मे देखो और मुस्कुराओ. तुम जितने ही ऊंचे कौर्पोरेट क्षेत्र मे जाते हो , मुस्कुराहट कम होती जाती है. मैं सफलता को मुस्कुराहट से मापता हूं. जितनी गहरी मुस्कान होगी अह यह दर्शाती है कि तुम कितने सुरक्षित हो. और मेरे विचार मे यही है जो तुम्हारे कैरियर मे सफलता को दर्शाती है.

जीवन का ए.बी. सी. तुम्हारे अंदर विस्तार को लाता है. जीवन के प्रति सजगता, पूरि सृष्टि के प्रति अपनत्व और जीवन मे मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, यह हमारी दृष्टि को विस्तृत करने और हमारी जड़ों को गहरा करने मे सहायक होगी.

हंगेरी के विश्वविद्यालय ने दिया श्री श्री को सर्वोच्च सम्मान




बंगलूरू. जून 26.2009

आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक व लोकोपकारी पूज्य श्री श्री रविशंकर को स्ज़ेंट इस्ज़्वान विश्वविद्यालय हंगरी ने अपने सर्वोच्च सम्मान प्रोफेसर हॉनोरिस कॉज़ा (मानद प्रोफेसर) से सम्मानित करा.


श्री श्री,
इस समय युरोप के दौरे पर है. वे विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 10 वीं वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में वक्ता थे. स्ज़ेंट इस्ज़्वान विश्वविद्यालय के उप रेक्टर प्रो डॉ. लैस्ज़लो हॉरनॉक ने श्री श्री को इस सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा.

माओवादी मुद्दा : "वार्ता और आध्यात्मिक शिक्षा ही हल है" - श्री श्री


माओवादी मुद्दा : "वार्ता और आध्यात्मिक शिक्षा ही हल है" - श्री श्री

बंगलूरू. 23 जून, 2009. केन्द्र के द्वारा माओवादियों पर प्रतिबंध पर प्रतिक्रिया देते हुए आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक पूज्य श्री श्री रविशंकर ने आज कहा, "माओवादीयों पर प्रतिबंध लगाने से शायद कोई मदद नहीं मिलेगी. उनकी विचारधारा का सामना वार्ता, प्रेरणा और सबसे महत्वपूर्ण रूप से आध्यात्मिक शिक्षा से किया जा सकता है. किसी को आतंकवादी घोषित करने से हम अपने कृत्यों को सही साबित कर देते हैं पर उनकी मानसिकता में बदलाव नहीं आ पाता."

स्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा, "आध्यात्मिक शिक्षा के अभाव की कारण ही माओवाद की वृद्धि हुई है. अधिकांश माओवादी हिन्दु हैं. दुर्भाग्य से, उन्हें अपने ही आध्यात्मिकता के विषय में किसी ने शिक्षा नहीं दी जिसके कारण वे हिंसा के रास्ते पर निकल पड़े. "

युवाओं में आध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा, "धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, हमने अपनी शिक्षा से पूरी तरह से आध्यात्मिक सामग्री को समाप्त कर दिया है. भारत जिससे पश्चिम देश भी आध्यात्मिकता सीखते है उसी देश को आध्यात्मिक शिक्षा की कमी की वजह से नक्सलवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है".


इस संदर्भ में उन्होंने सरकार को सभी सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में आध्यात्मिक शिक्षा शुरू करने के लिए आग्रह किया, जो बच्चों को सभी धर्मों के सुन्दर पहलुओं को उजागर करे तकि च्चे सभी धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रति सम्मान रख सकें.