February 12, 2010

अभी तो बच्चा हूं जी: श्री श्री रवि शंकर





नवभारत
 टाइम्स7th February, 2010

हर चेहरे पर मुस्कान देखने की तमन्ना रखने वाले आध्यात्मिक गुरु और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकरविश्वशांतिसौहार्द और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता के लिए भी जाने जाते हैं। पिछले दिनों 'मेरी दिल्लीमेरी यमुना'अभियान के तहत वह दिल्ली में थे। इस दौरान राजेश मिश्र और प्रभात गौड़ ने उनसे कई मुद्दों पर बातचीत की। पेश हैं इसबातचीत के प्रमुख अंश:

आपने यमुना की सफाई का अभियान शुरू किया हैलेकिन लोग हैं कि धर्म के नाम पर हवन सामग्रीफूल और  जानेक्या-क्यायमुना में प्रवाहित करते हैं। आप लोगों का आह्वान क्यों नहीं करते कि ऐसी चीजों को यमुना में बहाना धर्म केखिलाफ है?

जहां तक फूलपत्तेमिट्टी आदि का सवाल हैतो उसे पानी में बहाने में कोई हर्ज नहीं है। ये चीजें बायोडिग्रेडेबल होती हैंजिनका कोई नुकसान नहीं होता। असली दिक्कत तब आती है जब हम केमिकल और पेंट से बनी हुई चीजें यमुना या गंगा मेंबहाते हैं। ऐसी चीजों को रोकने के लिए लोगों में जागरूकता लाई जानी चाहिए।

शिवसेना और राज ठाकरे आजकल जिस तरह की विभाजन की राजनीति कर रहे हैंउससे देश को मुक्ति कैसे मिलेआपकोनहीं लगता कि इन्हें भी आर्ट ऑफ लिविंग की जरूरत है?

देखिएजनता में इसके प्रति सजगता जरूरी है। जनता अगर यह जान ले कि खंडित और सीमित सोच वाले ऐसे राजनेता सिर्फअपना उल्लू सीधा करने के लिए उन्हें बरगला रहे हैंतो ये अपने आप खत्म हो जाएंगे। जहां तक आर्ट ऑफ लिविंग की बात हैतो उससे तो सभी को फायदा होता है। जाहिर हैसभी लोगों में ऐसे राजनेता भी शामिल हैं।

अगर कोई शख्स लगातार हमारे साथ बुरा किए जा रहा है तो उसके साथ कैसे पेश आना चाहिए?

यह आपके भाव पर निर्भर करता है कि आप उसके साथ किस तरह पेश आएंगे। कोई भी इंसान बुरा नहीं होता। उसे कोई कोई तकलीफ होती है। हो सकता हैअपनी परेशानियों की वजह से वह बुरा बन गया हो। अगर आप उसे दंड भी देना चाहते हैंतो उसके पीछे मकसद सुधार का होना चाहिए। सुधारक के दृष्टिकोण से कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं होता। सीमित ज्ञान याअज्ञान की वजह से कोई व्यक्ति बुरा बन जाता है। उसे एजुकेट और प्रशिक्षित करना ही सही रास्ता है।

भारत पर भूतकाल में कई हमले हुए हैं। वर्तमान में भी हम निशाने पर हैं। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

हमलावरों को ऐसे ही छोड़ देना ठीक नहीं है। ऐसी परिस्थिति आने पर हमें कठोर कार्रवाई करनी चाहिएलेकिन दूसरों के साथसख्ती के बावजूद हमारा भाव सुधार का ही होना चाहिए।

आप कहते हैं - एक्सेप्ट द सिचुएशन एज इट इज। क्या गलत को भी स्वीकार कर लें?

पहले स्वीकार करो कि यह गलत है। यह मत पूछो कि क्यों गलत है। हमारी सारी परेशानियां की वजह यह है कि हम सोचते हैंकि ये क्यों गलत हैकिसी ने ऐसा क्यों कहाभूतकाल को हम क्वेश्चन करते रहते हैं। इससे हम और भी ज्यादा परेशान होजाते हैं। स्वीकार मतलबभूतकाल को स्वीकार करना कि ऐसा है। चोर क्यों हैये पूछने से कोई फायदा नहीं है। चोर है येस्वीकार कियाफिर उसके लिए जो सजा तय हैउसे मिलनी चाहिए।

अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?

मैं तो अभी बच्चा ही हूं। मेरा बचपन कभी खत्म ही नहीं हुआ है।  आगे होने की संभावना है। मैं जैसा पहले थाआज भी वैसाही हूं।

आपने शादी नहीं की?

(हंसकरमैंने कहा मैं अभी बच्चा हूं और अपने देश में बाल-विवाह गैरकानूनी है।

ज्ञान प्राप्ति के बाद आपमें क्या बदलाव आए?

मैं पहले से ऐसा ही हूं। मुझमें कुछ बदलाव नहीं आए। बस भीतर एक तड़प थी जो खत्म हो गई।

10 दिन की मौन साधना में क्या हुआ?

जो मैं थावह औरों को दिखाना चाहता थाबताना चाहता था। दूसरों को उसकी अनुभूति करानी थी। एक प्रेम का अनुभव दूसरेलोगों में पैदा करना चाहता था। दस दिन के मौन के बाद अपने आप ही वह मार्ग मिल गया।

लेकिन कुछ तो चेंज आए होंगे?

हां कुछ तो था जिसे बाहर निकालना थालोगों के बीच बांटना था। लेकिन उससे पहले भी हम योगप्राणायाम और ध्यान लोगोंको सिखाते थे। उस वक्त लगता था कि कुछ और भी भीतर है जो लोगों के बीच पहुंचाना है। दस दिनों की साधना के दौरान यहअनुभूति होने लगी कि 'सुदर्शन क्रियाके इस विशिष्ट ज्ञान को औरों तक पहुंचाना है।

सेक्स के बारे में सही नजरिया क्या होना चाहिएब्रह्माचर्य या फिर जितनी मर्जी उतना करो?

यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। अगर कोई सेक्स की अति पर पहुंच जाएतो ऐसे लोगों के लिए तंत्र में कई तरह की साधनाओंका जिक्र है। सेक्स से परे जाने के लिए भारत के कुछ मंदिरों में नग्न प्रतिमाओं के सामने बैठकर ध्यान करने की भी पद्धतिरही है। साधक वहां बैठकर ध्यान करते थे और सेक्स से ऊपर उठ जाते थे। लेकिन ये सबके लिए नहीं है। सबको इसकी जरूरतभी नहीं है। ध्यान और प्राणायाम करने से भी शरीर और मन की तरंगें बदलती हैं। और व्यक्ति आत्मिक रूप से मजबूत होजाता है।

क्या आप ब्रह्माचर्य के पक्ष में हैं?

ब्रह्माचर्य सहज ही सिद्ध हो तो ठीक हैलेकिन भावनाओं का दमन नहीं करना चाहिए। प्राणायामध्यान और योग के मार्ग मेंजो उतरते हैं उनका ब्रह्माचर्य सहज ही फलित होने लगता है।

आप हर चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं। यह कैसे संभव है?

देखिएजो हमारे समाने आता हैवह तो मुस्कुराता ही है। और में उसी चेहरे को देखता हूंजो मेरे सामने आता है।

आप दुनिया को क्या देना चाहते हैं?

मेरे पास सबके लिए बस प्रेम ही प्रेम है। मैं प्यार ही दे सकता हूंप्यार के सिवा कुछ भी नहीं।

लेकिन एक आम आदमी के लिए आपसे मिलना और आप तक पहुंचना बेहद कठिन है।

नहींऐसा तो नहीं है। मैं तो रोजाना हजारों लोगों से मिलता हूंउनसे बात करता हूं। हांकई बार व्यस्त कार्यक्रम के चलतेवक्त निकालना मुश्किल हो जाता है।

हमारे रीडर्स के लिए आपका कोई संदेश?

जीवन एक उत्सव है। इसे मस्त होकर जीना चाहिए। रूखा सूखा जीना भी क्या जीनाअगर हम ये समझ सकें तो सारे तनावों सेमुक्त हो जाएंगे। इसलिए कहता हूं हंसो और हंसाओमत फंसो और फंसाओ।

February 10, 2010

शिवरात्रि – सर्वव्यापक चेतना की जागृति का उत्सव

पूरी सृष्टि शिव जी का खेल है, उस एक चेतना, एक बीज का नृत्य है जिससे संसार के लाखों जीव प्रकट हुए हैं| सारा विश्व शिव के भोलेपन और ज्ञान के शुभ लय में चल रहा है। उर्जा का स्थाई एवं अनन्त स्त्रोत शिव हैं वे अस्तित्व के इकलौते शाश्वत स्वरूप हैं।

शिवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है वह रात्रि जो तीन साधनों में शिवतत्व को समाहित करती है, वह तत्व जो सबसे परे है। समाधि को शिवसायुज्य, शिव की उपस्थिति भी कहा जाता है, जिसका वर्णन करना बहुत कठिन है। कबीरदास जी ने इसे कोटि कल्प विश्राम- एक क्षण में समाहित करोड़ों वर्षो का विश्राम कहा है। यह सजगता से युक्त गहनतम विश्राम की स्थिति है जो सभी प्रकार की पहचान से मुक्ति दिलाती है।

जब मन दिव्यता की गोद में विश्राम करता है तो वही सच्चा विश्राम है। संस्कृत में रात्रि शब्द का अर्थ है- वह जो तीन प्रकार की व्यथाओं से आप को मुक्त करे। यह तीन साधनों-शरीर, मन और वाणी को विश्राम देती है। वह तीनों प्रकार के दुःख से हमें राहत देती है। ॐ शांति, शांति, शांति हमें तीन स्तरों पर शांति चाहिये शरीर, मन और आत्मा के स्तर पर अधिभौतिक, अधिदैविक, और आध्यात्मिक। केवल तीनों के होने पर ही सम्पूर्ण शांति मिलती है।

शिवरात्रि तब है, जब शिव तत्व और शक्ति एक हो जाते है । शिव तथा शक्ति के मिलन की एक कहानी शिवरात्रि से संबंधित है। आदि तथा चैतन्य शक्ति का अवचेतन से गठबंधन है। शिव मौन साक्षी, चिदाकाश है तथा शक्ति, चित्ति अथवा चित्तविलास है, वह शक्ति जो इस अनंत आकाश में भिन्न-भिन्न आकार, विचार रचती है। शिव निराकार हैं, जबकि शक्ति साकार रूप में प्रकट हुई हैं।  यही पदार्थ और ऊर्जा के द्वैत रूप की पहचान है, प्रकृति और पुरूष,  द्रव्य और गुण,  पदार्थ और उसके गुण। ब्रह्माण्ड में अंतर्निहित अद्वैत स्वरूप की पहचान ही शिवरात्रि है।

शिव को विनाश के साथ जोड़ दिया जाता है; परन्तु परिवर्तन तभी आयेगा, बेहतरी के लिए नई शुरूआत तभी हो सकती है जब कुछ नाश किया जाए। शिव परिवर्तन के तत्व हैं। शंकर का अर्थ हे जो शांति देता है और बहुत कुछ अच्छा करता है । शिव तत्व सर्वव्यापक है। शिवरात्रि इसलिये शुभ है क्योंकि वातावरण उस समय अधिक जागृत हो जाता है।

सर्वव्यापक चेतना की जागृति का पर्व - शिवरात्रि की रात को निद्रा की बेहोशी की अवस्था में जाये बिना मनाया जाता है। यह एक अवसर है जब व्यक्ति हर प्रकार की निद्रा से स्वयं को जगा सकता है। जागरण का अर्थ केवल ऊंची आवाज में भजन गाना या हठपूर्वक स्वयं को जगाए रखना नहीं है। यह है स्वयं को जागृत रखना, आत्मोन्मुख होना एवं अपने अंदर उस विश्राम के प्रति सजग होना, जो नींद में आप को वैसे भी प्राप्त होता है। जब नींद आने की एक अवस्था को आप पार कर लेते हैं तो फिर समाधि लग  जाती है या शिव सायुज्य हो जाता है।

शिव का प्रतीक लिंग है। दिव्यता लिंग के परे है। इसलिए ईश्वर को एकलिंग कहते हैं। आत्मा एकलिंग है। आत्मा शरीर, मन या बुद्धि के परे है,  वह प्रिय और अप्रिय से भी परे है,  आत्मा केवल एक ही है, वह एकलिंग है। शिव शक्ति (शिव की उर्जा ) सभी लिंगों से आकर शिवरात्रि में लीन हो जाती है ।

शिव बहुत ही सरल देव है वे भोले हैं भोलानाथ। किसी को उन्हें खुश करने के लिये बस बेल पत्ता ही चढ़ाना होता है। परन्तु इस सरलता में एक गहरा संदेश है- बेल पत्र को भेंट करना यह दर्शाता है कि स्वभाव के तीनों गुणों का समर्पण कर दो - तमस, रजस और सत्व। अपने जीवन की  सकारात्मकता और नकारात्मकता को शिवजी को समर्पित करके आपको आनन्दविभोर हो जाना है। सबसे बड़ा चढ़ावा स्वयं का है। स्वयं को समर्पित कर देना जीवन में आनन्द पाने का सूत्र है ।

कैलाश शिवजी का प्रसिद्ध निवास स्थान है। कैलाश का अर्थ है जहाँ पर उत्सव हो । इसलिये जहाँ पर भी आनंद और उत्सव है, वहाँ पर शिवजी उपस्थित होते हैं। चाहे आप सन्यास में हो या संसार में आप शिव से नहीं बच सकते। उनकी उपस्थिति को हर समय महसूस करते रहना शिवरात्रि का सार है। भगवान शिव को हर समय आँख बंद करे हुए गले में नाग लपेटे हुए बैठे हुए दिखाया जाता है। किसी को यह  लग सकता है कि वे सो रहे है परन्तु इससे यह दर्शाता है कि भीतर से वे कैसे है - सर्प के जैसे हर समय सजग।

उनके चित्र में उन्हें हमेशा नीले रंग से दर्शाया जाता है। नीला रंग आकाश की विशालता को दर्शाता है। उनके सिर पर चन्द्र दर्शाता है कि उनके भीतर क्या है। इसलिये सारे भूत, प्रेत, राक्षस भी उनके गण में शामिल हैं। वे कह रहे हैं कि शिव की बारात में सभी प्रकार के लोग हैं। इसलिये इस विश्व में सब कुछ उस परम आत्मा का है। यह कहा जाता है कि ''सर्वम शिवमयम जगत''  - यह सारा जगत शिवमय है।     

शिवरात्रि इस बात का प्रतीक है कि आपके पास जो कुछ भी है उसके प्रति सजग हो जायें और कृतज्ञ हो जायें। सुख के लिये कृतज्ञ रहो जो जीवन में विकास लाता है और दुःख के प्रति भी कृतज्ञ रहो जो जीवन में गहराई प्रदान करता है। यह शिवरात्रि मनाने की सही विधि है।

परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी के द्वारा

January 2, 2010

सेवा करें और समृद्धि पायें 2010 का सन्देश

सेवा करें और समृद्धि पायें
परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी के द्वारा

            हर वर्ष हम नव वर्ष की शुरूआत दूसरों को खुशी और समृद्धि की शुभ कामनायें देकर करते हैं ।

            समृद्धि का सही लक्षण क्या है ? समृद्धि का लक्षण मुस्कराहट है। समृद्धि का लक्षण संतोष है। समृद्धि का चिन्ह है मुक्ति, मुस्कान तथा जो कुछ भी अपने पास है उसे निर्भय हो कर आस पास के लोगों के साथ बाँटने की मनःस्थिति । समृद्धि का लक्षण यह आस्था और आत्मविश्वास है कि जो कुछ भी मेरी आवश्यकता है वह मुझे मिल जाएगा।

            2010 का स्वागत एक वास्तविक मुस्कुराहट के साथ करें, एक ऐसी मुस्कुराहट जो भीतर से हो। कलैंडर के पन्ने पलटने के साथ साथ हम अपने मन के पन्नों को भी पलटते जाएँ । प्रायः हमारी डायरी स्मृतियों से भरी हुई होती है । आप देखें कि आपके भविष्य के पन्ने बीती हुई घटनाओं से न भर जाएँ । बीते हुए समय से कुछ सीखें, कुछ भूलें और आगे बढ़ें ।

आप लोभ, घृणा, द्वेष, तथा ऐसे अन्य सभी दोषों से मुक्त होना चाहते हो । यदि मन इन सभी नकरात्मकताओं में लिप्त है तो वह खुश तथा शांत नहीं रह सकता । आप अपना जीवन आनंदपूर्वक नहीं बिता सकते । समझें कि नकारात्मक भावनाएँ भूतकाल की वजह से हैं। वर्तमान जीवन के अनुभव को आपका भूतकाल नष्ट न करने पाये । भूतकाल को क्षमा कर दें । यदि आप अपने बीते हुए समय को क्षमा नहीं कर पाएँगे तो आप का भविष्य दुःखपूर्ण हो जाएगा । पिछले साल, जिनके साथ आप की अनबन रही है, इस साल आप उनके साथ सुलह कर लें । भूत को छोड़ कर नया जीवन शुरु करने का संकल्प करें ।

इस बार नववर्ष के आगमन पर हम इस पृथ्वी के लिए शांति तथा संपन्नता के संकल्प के साथ सभी को शुभकामनाएँ दें । आर्थिक मंदी, आतंकवाद की छाया तथा बाढ़ तथा अकाल के इस समय में और अधिक निःस्वार्थ सेवा करें । जानें कि इस संसार में हिंसा को रोकना ही हमारा प्राथमिक उद्देश्य है, तथा विश्व को सभी प्रकार की सामाजिक तथा पारिवारिक हिंसा से हमें मुक्त करना है। समाज के लिए कुछ अच्छा करने का संकल्प लें, जो पीड़ित हैं उन्हें धीरज दें ।

जब भी आप लोगों के लिये उपयोगी हुए तो उसका पुण्य भी आपको मिला -  वह लुप्त नहीं होता। आपके द्वारा किये गये अच्छे कर्म हमेशा पलट कर आपके पास वापस आयेंगे। आज आपके पास यह पूरा विश्व एक परिवार जैसा है। यह हमें महसूस करना है कि हर कोई आपके ही परिवार का हिस्सा है। पूरे राष्ट्र के लिये जिम्मेदारी लें। फिर कोई दुःख नहीं होगा।

            जीवन का आध्यात्मिक पहलू हम में संपूर्ण विश्व और संपूर्ण मानवता के प्रति और अधिक अपनापन, उत्तरदायित्व, संवेदना तथा सेवा का भाव विकसित करता है। सच्चा आध्यात्मिक पहलू जाति, धर्म, तथा राष्ट्रीयता की संकुचित सीमाओं को तोड़ देता है तथा सभी में व्याप्त जीवन ऊर्जा से अवगत कराता है ।

अपनी आंखों को खोलें और देखें की आपको कितना कुछ मिला हुआ है। इस नव वर्ष   पर यह ध्यान दें कि आपको क्या मिला है,  इस पर नहीं कि आपको क्या नहीं मिला। यह कृतज्ञता लाता है। आप जितने कृतज्ञ होंगे उतना अधिक आपको मिलेगा। इसके विपरीत आप जितनी शिकायत करेंगे, उतना ही आपसे ले लिया जायेगा। यीशु मसीह ने भी यही कहा था कि ''जिसके पास है उनको और अधिक मिलेगा और जिसके पास नहीं है उनके पास जो भी है वह उनसे ले लिया जायेगा।'' इसका यही अर्थ है।   

            जो हम से कम सम्पन्न है उनके पास पहुँचे और आभार की भावना के साथ उनकी सहायता करें। आप यह अनुभव करेंगे कि जब आप नि:स्वार्थ सेवा करते हैं तो आपको कितना अधिक संतोष मिलता है। इससे आपको यह भी पता चलेगा कि आपकी अपनी समस्या बहुत छोटी हैं । बार-बार मन में कहना कि ''मुझे क्या मिलेगा?'' मानसिक अवसाद का सबसे बड़ा कारण है। ''मुझे क्या मिलेगा?'' समृद्धि की कमी का लक्षण है।

            इस वर्ष पंछी की तरह मुक्त हो जायें। अपने पंखों को खोलें और उड़ना सीखें। इसको स्वयं अपने भीतर अनुभव करना है। और कुछ भी नहीं है। यदि आप अपने को बंधन में महसूस करते हो तो फिर आप बंधन में ही रहोगे। मुक्त हो जायें। आप अपनी स्वतंत्रता को कब महसूस करेंगे? मरने के बाद? अभी इसी क्षण मुक्त हो जायें। बैठ कर तृप्त हो जायें। कुछ समय ध्यान और सत्संग में बैठें। यह आपके मन को शांत तो करता ही है और साथ ही संसार की चुनौतियों का सामना करने के लिये आपकी चेतना को आंतरिक बल देता है।

            जब मन विश्राम करता है तब बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है । जब मन आकांक्षा, ज्वर या इच्छा जैसी छोटी छोटी चीज़ों से भरा हो तब बुद्धि क्षीण हो जाती है । और जब बुद्धि तथा ग्रहण क्षमता तीक्ष्ण नहीं होती तब जीवन को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। नये विचार नहीं आते  तथा हमारा सामर्थ्य दिन-प्रतिदिन कम होने लगता है। इस ज्ञान से हम अपने छोटे मन के दायरे से बाहर कदम निकाल सकते हैं और यह कदम जीवन की कई समस्याओं का समाधान देगा। केन्द्रित रहने से हमेशा खुशी पास रहती है। इसी शांति से प्रतिभायें उभरती हैं। सहज ज्ञान मिल जाता है, सुंदरता आ जाती है, शांति आती है, प्रेम प्रकट होता है। समृद्धि आती है।

November 3, 2009

श्री श्री इज़राइल मे

धर्म को धर्मनिरपेक्ष, व्यापार का सामाजीकरण और राजनीति का आध्यात्मिकरण
           
बेंगलुरु, अक्टूबर 21,2009: द आर्ट ऑंफ लिविंग के  संस्थापक परम पूज्य श्री श्री रविशंकरजी जो इज़राइल मे 19 से 23 अक्टूबर ,2009 तक पाँच दिवसीय दौरे पर है ने टी ए विश्वविघालय मे व्यापार जगत के नेताओं को सम्बोधित करते हुए बेहतर विश्व के लिये '' धर्म को धर्मनिरपेक्ष, व्यापार का सामाजीकरण और राजनीति का आध्यात्मिकरण '' करने की बात कही । इस देश मे श्री श्री दूसरी इज़राइली राष्ट्रपति सम्मेलन मे सम्बोधित करने गये है । इस सम्मेलन का शीर्षक '' फेसिंग टूमोरो '' है और इसका उद्धाटन इज़राइल के माननीय राष्ट्रपति शिमोन पेरेस द्वारा किया गया और इसमे श्री श्री माननीय राष्ट्रपति के साथ मंच पर हिस्सेदार होंगे ।
इस सम्मेलन मे आर्थिक मंदी, निरंतर पारिस्थितिकी विकृति, मध्य पूर्वी देशो मे राजनीतिक अस्थिरता और ईरान की परमाणु शस्त्र प्राप्त करने की पहल जैसे विषयो पर चर्चा होगी ।इसमे विश्व के अनेक गणमान्य लोग,बुध्दिजीवी, राजनेता और अनेक प्रधान मंत्री,मंत्रीगण,और राजदूत सम्मलित है ।
सम्मेलन के दौरान एक चर्चा के अलावा, दिनांक 22 अक्टूबर 2009 को श्री श्री का प्रसिध्द इज़राइली पत्रकार, टीवी और रेडियो निर्माता दन शिलोन के द्वारा साक्षात्कार लिया जायेगा । दन शिलोन को विशेष अतिथियो जिनके जीवन की कथा उपलब्धियो, सृजनकता और नेतृत्व का शानदार प्रदर्शन है का  साक्षात्कार करने का 45 वर्ष का विशाल अनुभव है ।



प्रथम दिन टी ए विश्वविघालय मे व्यापार जगत के नेताओं को श्री श्री ने सम्बोधित किया, हरब्यिु विश्वविघालय मे सार्वजनिक चर्चा मे '' युवा वर्तमाान का नेतृत्व ''शीर्षक पर सार्वजनिक चर्चा  दी और इज़राइली संसद मे मुलाकात एवं चर्चा करी ।
टी ए विश्वविघालय मे श्रोताओ को सम्बोधित काते हुए श्री श्री ने महत्वपूर्ण चुनौतीया  जैसे शांति, आतंकवाद,  व्यापार मे  नैतिकता, युवाओ के विषय इत्यादि पर गहराई से प्रकाश डाला । उन्होने कहा '' शांति सिर्फ संघर्ष का अभाव नही है । यह भितर की सकारात्मक भावना है ं। शांति और समृध्दि साथ मे चलते है । यदि कही शांति है तो वहा काफी समृध्दि होगी । मध्य पूर्वी देशो मे शांति स्थापित हो, आज यह पूरे विश्व की कामना है ।
द आर्ट ऑंफ लिविंग संस्था इज़राइल मे वर्ष 2003 से सक्रिय रुप से कार्य कर रही है, जब श्री श्री ने इज़राइल का दौरा किया और यहूदी ,इसाई,मुसलमानी और ड्ररुज़ समूदाय के धार्मिक गुरुओ को शांति का संदेश दिया ।उनके दौरे के उपरांत द आर्ट ऑंफ लिविंग कार्यशाला और आघात देखरेख कार्यक्रम प्रभावित क्षेत्रो आयोजित किये जा रहे है जिसमे गाज़ा पट्टी, वेस्ट बैंक क्षेत्र, जेरुसलेम,टूलकरेम, हैफा और सडेरोट सम्मलित है ।

October 17, 2009

दिवाली : हर दिल में प्रेम का दिया जलाते चलो - परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर

एक दीपक की बाती को जलने के लिये उसे तेल में डूबे होना चाहिये, और साथ ही तेल के बाहर भी रहना चाहिये. यदि बाती तेल में पूरी डूब जाये तो वह प्रकाश नहीं दे सकती. जीवन भी दीपक की बाती के समान है, तुम्हें संसार में रहते हुए भी उसके ऊपर निष्प्रभावित रहना होता है. अगर तुम पदार्थ जगत में डूबे हुए हो, तो जीवन में आनन्द और ज्ञान नहीं ला पाओगे. संसार में रहते हुए भी, सांसारिक माया के ऊपर उठकर  हम  आनन्द और ज्ञान के ज्योति प्रकाश बन सकते हैं.  
इस प्रकार से ज्ञान के प्रकाश के प्रकट होने का उत्सव ही दिवाली है. दीपावली बुराई पर अच्छाई का, अन्धकार पर प्रकाश का और अज्ञान पर ज्ञान के विजय का त्योहार है। इस दिन घरों में करी जाने वाली रोशनी न केवल सजावट के लिये होती है, बल्कि वह जीवन के गहरे सत्य को भी अभिव्यक्त करती है। हरेक दिल में प्रेम और ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित करें और सभी के चेहरों पर सच्ची मुस्कान लायें.
प्रत्येक मनुष्य में कुछ सद्गुण होते हैं। आपके द्वारा प्रज्ज्वलित प्रत्येक दीपक इसी का प्रतीक है। कुछ में धैर्य होता है, कुछ में प्रेम, शक्ति, उदारता, अन्य में लोगों को साथ मिलाकर चलने की क्षमता होती है। आप में स्थित अव्यक्त सद्गुण दीपक के समान हैं। केवल एक ही दीप जला कर संतुष्ट न हों;  हज़ारों दीप प्रज्जवलित करें क्योंकि अज्ञान के अन्धकार को दूर करने के लिये अनेक ज्योत जलाने होंगे । ज्ञान की ज्योति प्रज्जवलित होने से आत्मस्वरूप के सभी पहलु जाग्रत हो जाते हैं. और उनका जाग्रत और प्रकाशित हो जाना ही दीपावली है.
जीवन का एक और गूढ़ रहस्य दिवाली के पटाखों के फूटने में है। जीवन में कई बार आप पटाखों के समान अपनी दबी हुई भावनाओं, कुंठाओं और क्रोध के कारण अति ज्वलनशील रहते हैं – बस फूटने के लिये तैयार. अपने राग- द्वेष, घृणा आदि को दबाकर फटने की उस स्थिति तक पहुँच जाते कि अब फूटे कि तब. पटाखे फोड़ने की प्रथा हमारे पूर्वजों द्वारा, लोगों की दबी हुई भावनाओं से मुक्ति पाने का एक सुन्दर मनोवैज्ञानिक उपाय है। जब आप बाहर विस्फोट देखते हैं तो आपके अंदर भी वैसी ही कुछ अनुभूति होती है. विस्फोट के साथ प्रकाशपुंज भी होता है। और आप अपनी दबी हुई भावनाओं से मुक्त होते हैं फिर अन्दर में शांति का उदय होता है।
अपने नित नूतन और चिर पुरातन स्वभाव का अनुभव करने के लिये इन दबी हुई भावनाओं से मुक्त होना अति आवश्यक है. दीपावली का अर्थ है वर्तमान क्षण में जीना, अत: अतीत का पछतावा और भविष्य की चिंता छोड़ कर वर्तमान क्षण में जीयें. 
दीपावली की मिठाइयों और उपहारों के आदान प्रदान के पीछे भी एक मनोवैज्ञानिक पहलु है. पुरानी गलतफ़हमी की कड़वाहट को छोड़कर सम्बन्धों को मधुर बनाते चलो.
सेवा भाव के बिना हर उत्सव अधूरा है. परमात्मा ने जो कुछ भी हमें दिया है उस प्रसाद को हमें सबके साथ बाँटना है. क्योंकि जितना बाँटेंगे उतना ही उसकी कृपा और बरसती है. सही मायने में यही दीपावली का उत्सव है. उत्सव का और एक अर्थ है - अपने मतभेदों को मिटाकर अद्वैत आत्मा की ज्योति से अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में विश्राम करना. दिव्य समाज की स्थापना के लिये हर दिल में ज्ञान व आनन्द की ज्योत जलानी होगी. और वह तभी सम्भव है यदि सब एक साथ मिलकर ज्ञान का उत्सव मनायें.
बीते हुए वर्ष के झगड़े फ़साद और नकारात्मकताओं को छोड़कर अपने भीतर उदित हुए ज्ञान पर प्रकाश डालकर एक नयी शुरुआत करना ही दीपावली का उत्सव है. जब सच्चा ज्ञान उदित होता है तब उत्सव होता है। अधिकतर उत्सव में हम अपनी सजगता या एकाग्रता खोने लगते हैं। उत्सव में सजगता बनाए रखने के लिये, हमारे ऋषियों नें प्रत्येक उत्सव को पावन बनाकर पूजा विधियों के साथ जोड़ दिया। इसलिये दिवाली भी पूजा का समय है। दिवाली का आध्यात्मिक पहलु उत्सव में गहरायी लाता है। प्रत्येक उत्सव में आध्यात्म होना चाहिये क्योंकि आध्यात्म के बिना उत्सव छिछला होता है।
जो ज्ञान में नहीं हैं उनके लिये वर्ष में एक बार ही दिवाली आती है, किंतु जो ज्ञानी हैं उनके लिये प्रत्येक दिन, प्रतिक्षण दिवाली है। इस दिवाली को ज्ञान के साथ मनायें और मानवता की सेवा करने का संकल्प लें. अपने दिल में प्रेम का दीपक जलाओ; घर में समृद्धि का दीपक जलाओ; औरों की सेवा के लिये करुणा का दीपक जलाओ; अज्ञान के अन्धकार को मिटाने के लिये ज्ञान का दीपक जलाओ; और हमें दिव्यता द्वारा दिये सम्पन्नता के लिये शुक्राने के दीपक जलाओ.