January 21, 2009

पुरुषार्थ और भाग्य

पुरुषार्थ और भाग्य

जब लोग भूतकाल को पुरुषार्थ मानते हैं तो वह आत्मग्लानि व पश्चाताप से भर जाते हैं। जब वे भविष्य को भाग्य मानते हैं तब सुस्ती और जड़ता प्रभावी हो जाती है। ज्ञानी भूतकाल को भाग्य और भविष्यकाल को पुरुषार्थ मानते हैं। जब तुम भूतकाल को नियति मान लेते हो तब और अधिक प्रश्न नहीं उठते हैं और मन को आराम मिल जाता है। और जब तुम भविष्यकाल को पुरुषार्थ मानते हो तब तुम उत्साह और गतिशीलता से भरे जाते हो। बेशक भविष्य को पुरुषार्थ मानने पर कुछ अनिश्चितता होगी और कुछ चिंता भी, लेकिन वह साथ में सतर्कता और रचनात्मकता भी ला सकती है।

 

भूतकाल को भाग्य मानो, भविष्य को पुरुषार्थ मानो, और वर्तमान में दैवत्व देखो।

 

प्रश्न : हम चिंता सॆ बाहर कैसे निकलें ?

उत्तर : दिव्य शक्ति पर विश्वास कर के और साधना करने से।

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