September 17, 2008

चिन्ता और भावनाएँ

साप्ताहिक ज्ञानपत्र 315
26 जुलाई, 2001
उत्तरी अमेरिका आश्रम क्यूबेक
कैनेडा

चिन्ता और भावनाएँ
सिर में चिन्ता रहती है और दिल में भावनाएं। दोनों एक ही समय पर कार्य नहीं कर सकते। जब तुम्हारी भावनाएँ प्रबल होती हैं तब चिन्ताएँ घुल जाती हैं। यदि तुम बहुत चिन्ता करते हो, तुम्हारी भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं; तुम सिर में ही अटक जाते हो। चिन्ताएँ तुम्हारे दिमाग और दिल को निष्क्रिय और सुस्त बना देती हैं। चिन्ताएं सिर पर पत्थर रखने जैसा है। चिन्ताएं तुम्हें उलझा देती हैं, तुम्हें एक पिंजरे में जकड़ लेती हैं। जब तुम्हें भावनाएं छूती हैं तब तुम चिन्ता नहीं करते। भावनाएँ फूलों के समान होती हैं वे निकलते हैं, खिलते हैं और विलीन हो जाते हैं। भावनाएँ उठती हैं, गिरती हैं और फिर लुप्त हो जाती हैं। जब हम भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं तब हमें आराम मिलता है। क्रोधित होने पर जब तुम अपना गुस्सा व्यक्त करते हो तो अगले ही पल तुम हल्का महसूस करते हो। दुःखी होने पर जब तुम रोते हो तो हल्के हो जाते हो। भावनाएँ कम समय के लिए रहती हैं और फिर लुप्त हो जाती हैं परन्तु चिन्ताएँ चिता समान हैं जो तुम्हें लम्बे समय तक खाती रहती हैं। भावनाएँ तुम्हें सहज बनाती हैं। बच्चे भावनाओं को महसूस करते हैं इसलिए वे सहज होते हैं परन्तु वयस्क अपनी भावनाओं पर लगाम लगाते हैं और चिन्ता करना शुरू कर देते हैं। किसी भी बात की चिन्ता से काम में रुकावट आता है जबकि भावनाएं काम को आगे बढ़ाती हैं। यदि हम अपनी नकारात्मक भावनाओं के प्रति चिन्तित हैं तो यह एक कृपा है क्योंकि ये चिन्ता इन भावनाओं पर लगाम लगाती हैं और तुम्हें उनपर कार्यवाही नहीं करने देती। आमूमन सकारात्मक भावनाओं के प्रति चिन्ताएँ कभी नहीं होती। चिन्ता में अनिश्चितता होती है। चिन्ता तुम्हारी उर्जा को नष्ट कर देती है, और जब तुम चिन्ता करते हो तब तुम स्पष्ट रूप से सोच नहीं पाते। चिन्ताओं को समर्पित करना प्रार्थना है और प्रार्थना तुम्हें भावनाओं की ओर ले जाती है।
प्राय: जब तुम सोचते हो कि तुम बहुत अधिक भावनात्मक हो गए हो तब तुम अपनी भावनाओं के बारे में चिन्ता करना शुरू कर देते हो । चलो इसकी चिन्ता छोड़ो और भोजन को महसूस करो।

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